सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अदालत की अवमानना के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस कर्णन को छह महीने की सजा सुनाई है। पुलिस उनकी तलाश कर रही है। न्यायाधीश के तौर पर अपने कार्यकाल में जस्टिस कर्णन विवादों में घिरे रहे हैं।
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मद्रास हाई कोर्ट में जज बनने से लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट में तबादले तक वो कई बार दलित होने के कारण भेदभाव का शिकार होने की शिकायत कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट के कई जज उनके आरोपों का निशाना रह चुके हैं।
कौन हैं जस्टिस कर्णन?
कुड्डालोर जिले के एक गांव में मध्य वर्गीय परिवार में 12 जून 1955 को जन्मे कर्णन के पिता स्कूल हेडमास्टर हुआ करते थे। आठ संतानों वाले इस परिवार में पिता ने सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाई। न्यायाधीश कर्णन के दो भाई वकील हैं वहीं एक भाई तमिलनाडु के विशेष सुरक्षा दस्ते में शामिल हैं।
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मंगलमपेट्टई हाई स्कूल से स्कूल पढ़ाई करने के बाद कर्णन ने वीरुथाटलम आर्ट्स कॉलेज में पढ़ाई की और फिर चेन्नई के न्यू कॉलेज से बीएससी की डिग्री ली। मद्रास लॉ कालेज से कानून की पढ़ाई लेकर कर्णन मेट्रो वॉटर जैसी सरकारी एजेंसियों में सलाहकार के तौर पर काम करने लगे और कई मामलों में वो सरकारी वकील के तौर भी पेश होते।
2009 में बने न्यायाधीश
2009 में मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ए के गांगुली की सिफारिश पर कर्णन को इसी अदालत में जज नियुक्त किया गया। मद्रास हाई कोर्ट में जज नियुक्त होते ही उनकी अदालत के अन्य न्यायाधीशों के साथ अनबन शुरू हो गई। 2011 में उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति/जनजाति आयोग को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि दलित होने के कारण उनके साथ भेदभाव हो रहा है और उन्हें नीचा दिखाया जा रहा है।
उन्होंने अपने चेंबर में संवाददाता सम्मलेन आयोजित कर मद्रास हाई कोर्ट के चार-पांच न्यायाधीशों पर भेदभाव करने का आरोप लगाया था। क्योंकि ये मामला हाई कोर्ट के न्यायाधीशों से जुड़ा था, इसलिए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति/जनजाति आयोग ने इस पत्र को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाड़िया को बढ़ा दिया।
लिव-इन रिलेशन पर टिप्पणी
जस्टिस कर्णन एक बार 2013 में फिर चर्चा में आए, जब उन्होंने एक लिव-इन रिलेशन में रह रही महिला से जुड़े मामले में सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी उन्होंने कहा कि दो वयस्कों के बीच अगर शारीरिक संबंध हो और फिर बच्चे का जन्म हो तो उन्हें पति-पत्नी के रूप में देखा जाना चाहिए। उनकी इस टिप्पणी पर पूरे भारत में उनका मजाक बनाया गया था। लेकिन कर्णन ने भी एक आदेश दिया कि कोई उनकी टिप्पणी का मजाक न बनाए।
2014 में एक बार फिर जस्टिस कर्णन ने सबको चौंकाया जब दो न्यायाधीश सिविल जजों की नियुक्ति के मामले को देख रहे थे, वो अदालत में घुसे और कहा कि सिविल जजों के नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही। उन्होंने कहा था कि वो इस मामले में हलफनामा भी दायर करेंगे। इसी घटना के बाद मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर के अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश पी सदाशिवम को खत लिखकर कर्णन के तबादले की अपील की थी।
कम से कम 20 जजों ने की थी करनन के तबादले की अपील
अगस्त 2014 में जब तक संजय किशन कॉल मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनकर आए तब तक कर्णन हाई कोर्ट के कई जजों से व्यक्तिगत तौर पर भिड़ चुके थे और कम से कम 20 न्यायमूर्ति सुप्रीम कोर्ट को कर्णन के तबादले की अपील के लिए खत भेज चुके थे। लेकिन कर्णन के आरोपों का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। 2015 में उन्होंने अपने एक साथी जज पर अपनी एक महिला सहायक से बदतमीजी का आरोप लगाया।
मामूली केस मिलने की शिकायत
न्यायमूर्ति कर्णन के आरोपों से मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कॉल भी नहीं बच सके। कर्णन ने कहा कि क्योंकि वो दलित हैं इसलिए जस्टिस कॉल भेदभाव कर रहे हैं और उन्हें मामूली केस थमा रहे हैं। यहां तक कि कर्णन ने जस्टिस कॉल के खिलाफ मामलों का स्वत: संज्ञान लेते हुए अदालत की अवमानना के आरोप लगाए।
गौर करने वाली बात ये है कि इन मामलों की जांच भी कर्णन खुद ही करते थे। जब से सी एस कर्णन जज बने हैं उनका आरोप रहा है कि उन्हें सिर्फ तलाक, गुजारा भत्ता या फिर मुआवजे जैसे मामले ही दिए गए, कोई महत्वपूर्ण केस उनके खाते में नहीं आया।
अपने तबादले पर खुद ही रोक लगाई
आखिरकार 2016 फरवरी में कर्णन का तबादला कलकत्ता हाईकोर्ट में कर दिया गया तो उन्होंने खुद ही इस पर रोक लगा ली। इतना ही नहीं उन्होंने अपने चीफ जस्टिस को ही नोटिस जारी कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तबादले पर रोक को खारिज कर दिया तो कर्णन यहीं नहीं रुके। उन्होंने इन दो जजों के खिलाफ नागरिक अधिकार सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज करने के लिए चेन्नई पुलिस को निर्देश दिया।
कर्णन की इस हरकत से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि कर्णन को कोई काम न दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद न्यायमूर्ति कर्णन ने माफी मांगी और कलकत्ता हाईकोर्ट जाने को तैयार हुए।
लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट जाने के बाद उन्होंने 23 जनवरी 2017 के दिन प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र लिखा जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाई कोर्ट के 20 न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। जिन न्यायाधीशों के नाम जस्टिस कर्णन की सूची में शामिल थे उनमें कुछ रिटायर हो चुके हैं, कुछ अभी भी न्यायाधीश हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अदालत की अवमानना मानते हुए 13 फरवरी को कर्णन को पेश होने का आदेश दिया।
लेकिन कर्णन के तेवर नर्म नहीं हुए, उन्होंने कहा कि सिर्फ संसद ही उनके खिलाफ इस तरह की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। जब वो अदालत में पेश नहीं हुए तो सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ 10 मार्च को एक गैरजमानती वॉरंट जारी कर दिया। इस वॉरंट को नकारते हुए जस्टिस कर्णन ने सीबीआई और संसदीय सचिवों को इस मामले की जांच के आदेश दिए। 13 अप्रैल को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों को 28 अप्रैल को उनके सामने पेश होने का आदेश दिया।
इसके बाद सात न्यायाधीशों की बेंच ने कर्णन की मानसिक जांच करने का आदेश दिया। इससे इनकार करते हुए कर्णन ने कहा कि उनकी मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक है।जस्टिस कर्णन ने हद तो तब कर दी सुप्रीम कोर्ट के सात जजों के खिलाफ गैर जमानती वॉरंट जारी कर दिया और फिर चीफ जस्टिस समेत अन्य जजों को पांच साल की सजा सुना दी।
लेकिन इस तकरार में आखरी दांव सुप्रीम कोर्ट की तरफ से चला गया जब जस्टिस कर्णन को छह महीने की सजा सुनाई गई। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को उनके इंटरव्यू या बयान दिखाने से भी रोका। जब से कर्णन जज बने हैं उनकी शिकायत रही है कि उन्हें मामूली केस दिए गए लेकिन वो खुद काफी चर्चा में रहे। अब 11 जून को वो सेवानिवृत्त हो रहे हैं।