बच्चों को पढ़ातीं बॉन्ड मैडम रेखा
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उनका बचपन मुफलिसी में बीता। पढ़ाई शुरू की तो पैसा आड़े आ गया, लेकिन हार नहीं मानी। मेहनत जब रंग लाई तो किस्मत चमक उठी, लेकिन अपने बीते हालात कभी जेहन से जाने नहीं दिए। फिर उन्होंने मदद की ऐसी 'रेखा' खींची कि जरूरतमंद बच्चों के लिए फरिश्ता बन गईं। दरअसल, यह पूरी कहानी है कर्नाटक की एक स्कूल टीचर रेखा कुलल की, जो अब तक 63 बच्चों की जिंदगी संवार चुकी हैं। रेखा गरीब बच्चों के नाम पर अपनी जेब से पैसे जमा करती हैं, जिससे उनकी तरह किसी दूसरे बच्चे को पैसे की वजह से पढ़ाई के लिए परेशान न होना पड़े।
बच्चों के नाम पर अपनी पैकेट से पैसे जमा करती हैं रेखा
शिक्षिका ने गरीब बच्चों के लिए मदद की ऐसी बड़ी रेखा खींची है कि इलाके के बच्चे और उनके माता-पिता के चेहरे पर मुस्कान लौट गई है। जी हैं 32 साल की रेखा कुलल कक्षा 1 में पढ़ने वाले बच्चों के नाम पर एक हजार रुपये अपनी पैकेट से बैंक में 10 साल के लिए जमा करती हैं और उसी पैसे से बच्चे हायर एजुकेशन प्राप्त करते हैं। उडुपी से करीब 80 किलोमीटर दूर होसानगर में नूलीगेरे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह मदद किसी वरदान से कम नहीं है। रेखा का मानना है कि गरीब बच्चों की जब दसवीं कक्षा पूरी हो जाएगी तो आगे की पढ़ाई के लिए यह धन उन्हें मदद करेगा।
समाज को लौटाना हमारा फर्ज- रेखा
बॉन्ड मैडम" के नाम से मशहूर रेखा कहती हैं कि यह सिलसिला 2014 में शुरू हुआ था। उस वक्त पांच छात्रों के नाम पर बैंक में एक हजार रुपये जमा कराए गए थे। फिर तो यह कारवां बढ़ता गया और आज 63 बच्चे इस पहल से लाभान्वित हो चुके हैं। रेखा टीचिंग लाइन में आने के लिए अपने शिक्षकों को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं। रेखा बताती हैं कि उनकी पढ़ाई काफी कढ़िनाइयों में हुई हैं। उसी दर्द को समझते हुए उन्होंने वंचित बच्चों को मदद करने का फैसला लिया है।
वह बताती है कि छोटी-छोटी मदद से बच्चों की उच्च शिक्षा हासिल करने में आसानी होगी। वह कहती है कि जब समाज ने हमें सबकुछ दिया है तो मेरा भी फर्ज बनाता है कि उचित समय पर समाज को कुछ लौटाऊ और यह उसी का परिणाम है। रेखा की इस पहल को स्कूल विकास प्रबंधन समिति और विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने भी सराहा है।
रेखा हर दिन दो घंटे सफर कर पहुंचती हैं स्कूल
रेखा को अपने घर से होसानगर स्थित स्कूल पहुंचने के लिए करीब दो घंटे का सफर तय करना पड़ता है। रेखा लेखक के अलावा एक वॉयसओवर कलाकार भी हैं। रेखा बताती है कि जबतक वह रहेंगी जरूरतमंदों के लिए बांड निवेश करती रहेंगी।
पैसे की कमी के कारण रेखा ने नहीं खरीदी थी साड़ी
रेखा के पति प्रभाकर कुलाल वन विभाग में अधिकारी हैं।वह बताते हैं कि रेखा को जरूरतमंदों को मदद करना इतना सुकून देता है कि टीचर्स ट्रेनिंग के दौरान अपने लिए एक साड़ी तक नहीं खरीदी। उसका मकसद है कि सरकारी स्कूल निजी संस्थानों के बराबर में रहे। जहां की पढ़ाई सभी के लिए एक नजीर बन सके।