विहिप के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार और अन्य।
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विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने मांग की है कि केंद्र सरकार धार्मिक अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा तय करे। संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यक शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुछ विशेष अधिकार अवश्य दिए गए हैं। विहिप का कहना है कि केवल अल्पसंख्यक होने के कारण देश के एक वर्ग को लगातार लाभ दिया जा रहा है, लेकिन दूसरे वर्गों को इसके कारण भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। विहिप ने कहा है कि यदि देश में धर्म के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं होता है तो किसी को धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक क्यों घोषित किया जाना चाहिए।
विहिप की सर्वोच्च संस्था 'केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल' की दो दिवसीय बैठक दिल्ली में बुधवार को संपन्न हुई। इस बैठक में शामिल लगभग 225 संतों की उपस्थिति में यह निर्णय किया गया है कि केंद्र सरकार से धार्मिक अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित करने की मांग की जाएगी। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की आबादी 14% से ज्यादा थी। अब यह आबादी 18 से 20 प्रतिशत तक हो गई है। विहिप का मत है कि इतनी आबादी वाले एक विशाल समूह को अल्पसंख्यक कहना सही नहीं होगा।
आलोक कुमार ने कहा कि विहिप इस मुद्दे पर व्यापक बहस करने की योजना पर काम करेगा। देश के अलग-अलग जगहों पर चर्चाएं आयोजित कर लोगों को यह बताया जाएगा कि धार्मिक आधार पर किसी से भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि क्या कोई धर्म-संप्रदाय विशेष के लोग सामाजिक रूप से ज्यादा पिछड़े रह गए हैं।
'जिहाद की जड़ें गरीबी में नहीं, कट्टर धर्मान्धता में हैं'
विहिप अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि हाल ही में दिल्ली के लालकिले के सामने बम विस्फोट हुए थे। इन धमाकों को अंजाम देने वाले आतंकवादी पिछड़े या गरीब नहीं थे। वे उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टर थे और ऊंचे वेतन पर काम करते थे। इससे यह साफ हो गया है कि गरीबी का आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है। कट्टर धर्मांध व्यक्ति कहीं भी हो, आतंकवादी हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जिहादी मानसिकता केवल कानून और व्यवस्था का विषय नहीं है। यह सामाजिक और धार्मिक मुद्दा भी है। उन्होंने कहा कि इस्लाम का एक वर्ग जिहाद करना अपना धार्मिक कर्तव्य मानता है और इसके लिए धोखा, लूट, अपहरण और नृशंस हत्याओं को स्वीकार करता है। ऐसी सोच को बदलना होगा। ऐसी विचारधारा का विरोध करना ही विश्व शांति के हित में है।