भारतीय नौसेना ज्यादा शक्ति, ज्यादा क्षमता और निगरानी से लैस एक दर्जन शक्तिशाली नावों को लद्दाख के लिए भेज रही है ताकि पैंगोंग त्सो झील पर पेट्रोलिंग कर चीन के शक्तिशाली जहाज टाइप 928 बी का सामना कर सके। पैंगोंग त्सो झील के पास ही चीनी सेना जमी हुई है।
यहां से चीन की सेना ने भारत के क्षेत्र में आकर भारतीय सेना और मोदी सरकार को जवाबी कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया था। चीन और भारत के बीच कल लेफ्टिनेंट स्तर पर बातचीत हुई जो 12 घंटे चली। इस बैठक में 3,488 किलोमीटर के वास्तविक नियंत्रण रेखा पर युद्ध की तीव्रता में कमी और जगह को छोड़ने को लेकर चर्चा हुई।
लद्दाख में ताकतवर नावें भेजने का फैसला तीनों सेनाओं ने मिलकर लिया। नौसेना को सी-17 ट्रांसपोर्टर के जरिए नावें भेजने के लिए कहा गया। हालांकि इन नावों को वायुमार्ग के जरिए भेजने में लॉजिस्टिक स्तर पर कुछ दिक्कतें आ रही हैं लेकिन नौसेना और थलसेना इसके समाधान पर विचार कर रही है।
इधर, नौसेना ने पूर्वीय और पश्चिमी तटों पर जहाजों को निगरानी के लिए लगा दिया है ताकि अंडमान समुद्र से लेकर फारस की खाड़ी तक निगरानी रखी जा सके। चीन एक तरफ पूर्व लद्दाख में शांति और मुक्ति की बात कर रहा है लेकिन साफ दिख रहा है कि एलएसी के 1,597 किमी पश्चिमी इलाके में चीनी आर्मी अपनी धाक जमाना चाहती है।
गलवां घाटी में सेना की टुकड़ी को इकट्ठा करना, गोगरा प्वाइंट पर सड़क बनाना, संचार के माध्यम को अपग्रेड करना और पैंगोंग त्सो झील पर इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना इस बात को दर्शाता है कि चीन की सेना का यथास्थिति बहाल करने का कोई इरादा नहीं है।
मोदी सरकार ने भारतीय सेना को स्थिति संभालने के लिए खुली छूट दे दी है। इधर भारतीय सेना और वायुसेना कड़ी निगरानी कर रही है लेकिन किसी तरह की झड़प की पहल नहीं करेगी बल्कि चीनी सेना को जवाब देने के लिए खड़ी है।