उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब दस महीने से कम का वक्त बचा है। मार्च 2022 तक नई सरकार का गठन करके मुख्यमंत्री चुना जाना है। ऐसे में तैयारी के लिए महज पांच-छह महीने बचे हैं। दूसरी ओर पंचायत चुनाव के नतीजे ने भाजपा और संघ के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब दस महीने से कम का वक्त बचा है। मार्च 2022 तक नई सरकार का गठन करके मुख्यमंत्री चुना जाना है। ऐसे में तैयारी के लिए महज पांच-छह महीने बचे हैं। दूसरी ओर पंचायत चुनाव के नतीजे ने भाजपा और संघ के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है।
प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों ने अपनी नाराजगी केंद्र और शीर्ष संगठन तक पहुंचाई है। राज्य के एक मंत्री ने माना कि 2022 बड़ी चिंता का विषय है। समझा जा रहा है कि इन चिंताओं को लेकर ही संघ के दूसरे नंबर के नेता दत्तात्रेय हसबोले इस समय प्रदेश में प्रवास पर हैं।
दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की टीम को यह समय एक बार फिर अवसर के रूप में दिखाई दे रहा है। टीम को लग रहा है कि पंचायत चुनाव के नतीजे, कोरोना से उपजी नाराजगी बड़ा अवसर बन सकती है। टीम केशव के सदस्य और एक विधायक दबी जुबान से मानते हैं कि सीएम पद के असली हकदार केशव प्रसाद मौर्य थे।
वह मुख्यमंत्री होते तो अन्य पिछड़े वर्ग की तमाम जातियां भाजपा का साथ छोड़कर न भागतीं। न ही पंचायत चुनाव में भाजपा का ऐसा हश्र होता। समझा जा रहा है शीर्ष नेतृत्व अब इस गड़बड़ी को अगले दो-तीन महीने में दूर कर लेना चाहता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल की पकड़ पार्टी में काफी मजबूत है। ऐसे में एक नई कोशिश शुरू होने की उम्मीद है।
ब्राह्मण, जाट, गूजर, पटेल, राजभर.. समेत अन्य को साधना चुनौती
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2017 के चुनाव में उसके साथ आई तमाम अगड़ी, पिछड़ी, अन्य पिछड़ी जातियों को फिर से पाले में लाना है। भाजपा में पूर्वी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के संपर्क प्रमुख का काम देखने वाले सूत्र का कहना है कि 2013 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया गया था।
इसके बाद अमित शाह ने काफी कोशिश की थी। जातिगत समीकरण का लाभ भी मिला। 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद और 2017 के पहले भाजपा ने तमाम अन्य पिछड़ी और अनुसूजित जाति के लोगों को भाजपा से जोड़ा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी लोग जुड़े। रालोद के चौधरी अजीत सिंह को मुंह ताकना पड़ गया। जनता समाजवादी पार्टी की भीतरी लड़ाई और अखिलेश-शिवपाल के झगड़े और बसपा की सरकार देख चुकी थी। लिहाजा भाजपा को बहुमत मिला। अब भाजपा संगठन से जुड़े लोग मानते हैं कि पंचायत चुनाव के नतीजे लोगों के दूर होने का संकेत हैं।
ब्राह्मण नाराज, जाट, गूजर गए किसानों के साथ, यादव एकजुट
भाजपा नेताओं का कहना है कि 2019 के बाद से तेजी से केमिस्ट्री बदली है। योगी सरकार के कामकाज के तरीके से ब्राह्मण क्षुब्ध हैं। प्रदेश सरकार के एक मंत्री तो इस मुद्दे पर फोन पर चर्चा में ही काफी परेशान हो जाते हैं। उनका कहना है कि किसानों के आंदोलन से जाट, गूजर नाराज हैं। राष्ट्रीय लोकदल के साथ चले गए।
ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल खौफ खाई हुई हैं। बताते हैं कि छोटी-छोटी जातियों को फिर समेटना बड़ी चुनौती है। भाजपा के ही नेताओं का कहना है कि अब यादव एकजुट हैं। मुसलमान एकमुश्त उसका साथ दे सकता है।
बताते हैं कि कोरोना में आम आदमी की परेशानी ने राज्य सरकार की कलई खोल दी है। बनारस प्रांत के एक प्रचारक का कहना है कि एक तरफ दर्द से परेशान लोग भटक रहे थे और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री को अफसर गलत जानकारी देकर शरीर में आग लग जाने वाला वक्तव्य दिलवा रहे थे। अब यह सब समेटना बड़ी चुनौती है।
संगठन के भीतर भी चल रही रार
एक मंत्री बताते हैं कि कभी शिव नारायण ने प्रदेश में संगठन को मजबूती दी थी। लेकिन वह मुख्यमंत्री योगी के निशाने पर थे। उन्हें कोई और जिम्मेदारी मिल गई। पिछले तीन साल से सुनील बंसल तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं। प्रांत प्रचारकों के तौर पर कुछ ऐसे चेहरे लाए हैं, जिनको समीकरण बिठाने में खासी दिक्कत हो रही है।
कुछ युवा अवसरवादियों ने भी संगठन में जिम्मेदारी हासिल कर ली है। लिहाजा अंदरूनी खींचतान चल रही है। संगठन से जुड़े एक अन्य अधिकारी कहते हैं कि कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और क्षेत्रीय दौरे पर आते थे तो जमीनी कार्यकर्ताओं से मिलते थे। उनका सम्मान करते थे।
प्रयागराज के एक नेता ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को गेस्ट हाउस में कच्ची सुर्ती तक रगड़कर खिलाई है। बताते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह वेवलेंथ नहीं दे पाते। केशव प्रसाद मौर्य, सिद्धार्थ नाथ सिंह समेत अन्य मंत्री आते हैं तो उनके चेहरे पर मंत्री वाला ही रुआब रहता है। कार्यकर्ता हाशिए पर हैं।
नाराजगी के स्तर को समझिए... राम मंदिर नहीं बनाएगी सरकार?
बनारस में बीएचयू के छात्रावास में जब केएन गोविंदाचार्य जाते थे तो उन्होंने ही भाजपा से एक नेता को जोड़ा था। अब वो नेता अपनी ही सरकार से इतने क्षुब्ध हैं कि नाम न छापने की शर्त पर कोसते नहीं थकते। बताते हैं कि अशोक सिंघल के एक आदेश पर उन्होंने बनारस में जान लड़ा दी और 56 साल की उम्र और राजनीति के 31 साल में इतना बुरा समय नहीं देखा। सूत्र का कहना है कि अगले छह महीने इसी तरह गए तो 2022 में भाजपा की सरकार नहीं बनेगी।
सूत्र का कहना है कि 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद हुए चुनाव में कल्याण सिंह को जनता ने बहुमत नहीं दिया था। मुलायम सिंह यादव राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। इसलिए केवल हिन्दू, मुसलमान, राम मंदिर ही काफी नहीं है। समर्पित कार्यकर्ता भी जरूरी हैं।