किसी भी केस में घटना स्थल पर पहुंचने वाली पहली एजेंसी कौन होती है, पुलिस होती है। सबसे पहले सबूत या गवाह किसके सामने आते हैं, पुलिस के सामने आते हैं। ऐसे में किसी भी केस को उसके अंजाम तक पहुंचाने में पुलिस सक्षम एजेंसी होती है, बशर्ते वह अपना काम ईमानदारी से करे तो। सीबीआई तो बाद का विकल्प है।
इन दोनों के बीच सरकार होती है, अगर पहले दिन से सरकार यह सोच ले कि इस केस को रफा-दफा करना है तो फिर कोई भी एजेंसी कुछ नहीं कर सकती। यूपी और असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक, बीएसएफ के डीजी रहे और पुलिस सुधारों के अग्रणी प्रकाश सिंह ने उन्नाव केस पर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विशेष बातचीत की है।
उनका साफ कहना है कि जब पानी सिर से उतर गया तो जाग रहे हो। इस केस में सीबीआई, पुलिस और राज्य सरकार की घोर लापरवाही सामने आई है। प्रकाश सिंह कहते हैं, अगर शुरु से ही पुलिस इस केस में ईमानदारी से अपना काम करती तो यह केस कब का सुलझ गया होता। स्थानीय पुलिस के पास पर्याप्त गवाह और सबूत थे, लेकिन उसने कुछ नहीं किया।
सीबीआई को केस चला गया। जिस तेजी से काम होना चाहिए था, सीबीआई उसमें पीछे रह गई। सभी एजेंसियों को यह मालूम था कि इस केस के गवाहों को डराया-धमकाया जा रहा है, मगर किसी ने कोई कदम नहीं उठाया। कम से कम दिल्ली हाईकोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार, गवाहों को सुरक्षा दी जा सकती थी, लेकिन नहीं दी गई।
पीड़िता को सुरक्षा देने की बजाए उसकी आवाजाही की जानकारी आरोपियों तक पहुंचा दी जाती। पूर्व डीजीपी ने हैरानी जताते हुए कहा, बड़े से बड़े केस में अपना दुख दर्द भूलकर लोग सीबीआई पर भरोसा जताने लगते हैं। इस केस में सीबीआई का काम भी ठीक नहीं रहा। केस की जांच से लेकर चार्जशीट तक, हर कदम पर देरी हुई है।
जाँच में कई पहलू छूट गए हैं। एक साल से सीबीआई जाँच में ही लगी है, जबकि बहुत से तथ्य सामने रहे हैं। किसी ने पूछा कि ये देरी क्यों हो रही है।
जब पीड़िता का परिवार खत्म हो रहा है तब हम न्याय की बात कर रहे हैं...
यूपी सरकार, सीबीआई और पुलिस को इस केस के बारे क्या कुछ मालूम नहीं था, सब कुछ मालूम था। सरकार की मंशा क्या रही है, सब जानते हैं। रेप पीड़िता का पिता पुलिस हिरासत में मर जाता है, उसके चाचा को पुलिस जेल में डाल देती है। इसके बाद पीड़िता पर समझौता करने का दबाव पड़ता है।
इस बाबत पीड़ित पक्ष की ओर से दर्जनों पत्र एजेंसियों को लिखे जाते हैं। जब समझौता करने से पीड़िता इन्कार कर देती है तो सड़क हादसा हो जाता है। बतौर प्रकाश सिंह, मैं पूछता हूं, जब न्याय लेने के लिए रेप पीड़िता का परिवार खत्म हो रहा है तब हम न्याय की बात कर रहे हैं।
वह पीड़िता ख़ुद अस्पताल में जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। खैर, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप कर यह उम्मीद जता दी है कि अब न्याय होगा, भले ही देरी से सही। अगर सभी मामले दिल्ली ट्रांसफर होते हैं तो यह भी अच्छी बात है।