ऐसी घटनाएं होंगी तो फायदा भाजपा को ही होगा
बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ पारी पर्दे के पीछे से खेली गई और कुछ पर्दे पर। चुनाव से ऐन पहले सीटों के बंटवारे में पूर्व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान अड़ गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बनाम चिराग पासवान मुद्दा भी चुनाव में खूब चला। भाजपा के तमाम बागियों ने चिराग की लोक जनशक्ति पार्टी से ही चुनाव लड़ा। अमित शाह पूरे चुनाव में प्रचार के लिए नहीं गए। जीतन राम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश सहनी सब साथ आए। चिराग पासवान प्रधानमंत्री मोदी के हनुमान बने रहे। चुनाव संपन्न हो गया। चिराग पासवान का दावा खोखला रह गया। नीतीश कुमार की जद(यू) को उम्मीद से आधी सीटों पर संतोष करना पड़ा। भाजपा के विधायक रिकार्ड संख्या में जीते। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने। अब नीतीश कुमार को चित और पट दोनों में अपना हित खोजना पड़ रहा है। दिलचस्प है कि चिराग पासवान भी अब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की दया पर ही हैं। अली अनवर जैसे पूर्व सांसद कहते हैं कि जब चाहे भाजपा पशुपति राम पारस और चिराग को आपस में मिला दे या फिर जैसे चाहे उनके साथ व्यवहार करे। भाजपा के नेता कहते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं। बिहार पर हमारे नेता अमित शाह की नजर रहती है।
दूसरी बड़ी राजनीति महाराष्ट्र में हुई। पहला ऑपरेशन लोटस 2019 में हुआ और 48 घंटे के लिए देवेंद्र फडणवीस राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। एनसीपी के शरद पवार ने पार्टी और राजनीति पर अपनी पकड़ का खामोश रहकर प्रदर्शन किया। नतीजतन शिवसेना के उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री हो गए। लुटियन जोन में यह चर्चा आम है कि तभी से राजनीति के सरदार शरद पवार और चाणक्य अमित शाह में राजनीतिक कुश्ती ठन गई थी। बताते हैं नतीजा आने में ढाई साल लग गए। एनसीपी के शरद पवार की भाजपा के कुछ केन्द्रीय नेताओं से बात होती रही। भाजपा और केंद्र सरकार एनसीपी के नेताओं पर अपना ऑपरेशन चलाती रही। शरद पवार को प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस, अजीत पवार और उनके करीबियों को आयकर विभाग का नोटिस, एनसीपी के कोटे के दो पूर्व मंत्रियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई, शिवसेना के तमाम नेताओं को विभिन्न एजेंसियों के नोटिस। सब चलता रहा। किसी को पता नहीं चला कि कब भाजपा ने शिवसेना में सेंध लगाई। शिवसेना में मुश्किल मानी जाने वाली सेंध इतनी बड़ी थी कि उद्धव ठाकरे को पैरों तले जमीन खिसक जाने का एहसास पूरी बाजी हार जाने के बाद हुआ। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे स्वीकारने में संकोच नहीं करते कि सबकुछ दिल्ली में बैठे बड़े नेताओं के सहयोग, आशीर्वाद से ही संभव हो पाया।
राष्ट्रपति चुनाव में खींच दी लकीर, बड़े अंतर से जीतीं द्रौपदी मुर्मू
महामहिम राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने वाली द्रौपदी मुर्मू को प्रधानमंत्री मोदी का विश्वास, स्नेह हासिल है। प्रधानमंत्री चाहते थे कि जीत का अंतर बड़ा हो। भाजपा मुख्यालय के नेता इसे सबका प्रयास बताते हैं, लेकिन विशेष प्रयास की बात आने पर श्रेय अमित शाह के ही खाते में जाता है। बताते हैं अमित शाह के निर्देशन में महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने राजनीतिक पैंतरे लिए और मुख्यमंत्री एकनाथ शिदे के दबाव के आगे शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे को भी मुर्मू का समर्थन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर ने भी पैंतरा बदला और भाजपा के नेता बड़े गर्व से कहते हैं कि राष्ट्रपति के चुनाव में करीब 100 जनप्रतिनिधियों ने द्रौपदी मुमू के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की। कुल मिलाकर विपक्ष की एकता तार-तार हो गई। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी, टीआरएस के चंद्रशेखर राव, बसपा की मायावती, बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव,आईएमआईएम असदुद्दीन ओवैसी के साथ विपक्ष की एकता का तालमेल गड़बड़ा जाता है।
अब राहुल गांधी के एजेंडे से आगे बढ़कर काम कर रही है भाजपा
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अश्विनी कुमार विपक्ष की एकता, 2024 में लोकसभा चुनाव और चुनौतियों पर अभी कोई बात नहीं करना चाहते। कुमार कहते हैं आप सब देख रहे हैं और जानते हैं कि क्या हो रहा है। वैसे भी अभी 2024 आने में समय है। चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की टीम में काम कर चुके सूत्र का कहना है कि भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस पार्टी को लेकर जो राजनीतिक एजेंडा सेट किया था, अब उससे आगे के एजेंडे पर काम कर रही है। सूत्र का कहना है कि अब राहुल गांधी और उनकी छवि भाजपा के लिए चुनौती नहीं है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की छवि को यूपी के विधानसभा चुनाव से झटका लगा है। वैसे भी कांग्रेस के ही नेता कांग्रेस का नुकसान कर रहे हैं और वहां सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। सूत्र का कहना है कि राष्ट्रीय पार्टी केवल भाजपा और कांग्रेस ही है। शेष क्षेत्रीय दल हैं और अन्य विपक्षी दल की भी स्थिति कांग्रेस से बहुत अलग नहीं है। इसलिए विपक्ष के लिए चुनौती तो बड़ी है।