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राहुल ने कहा था- चुनावी नतीजे जो भी हों, हम प्यार की भाषा ही बोलेंगे

Sat, 16 Dec 2017 09:02 PM IST
अतुल सिन्हा, अमर उजाला 
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चुनावी भाषणों के गिरते स्तर और नफरत की भाषा से आहत राहुल गांधी ने अपने आखिरी दौर की सभाओं में ये साफ कर दिया था कि चुनावी नतीजे चाहे जो हों, लेकिन कांग्रेस प्यार की भाषा ही बोलेगी, प्यार से कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलेगी, समाज के हर वर्ग के साथ मोहब्बत और एकता के साथ आगे बढ़ेगी। 
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पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद भी उन्होंने यही बात दोहराई। भाजपा नेताओं को ये जतलाने की कोशिश की नफरत की बुनियाद पर कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना कभी कारगर नहीं हो सकती और कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी ताकत है जो इस देश के संवैधानिक ढांचे के साथ-साथ सबको साथ लेकर चलने की ताकत रखती है।

दरअसल आज के दौर में प्यार का उनका ये संदेश सत्ता की सियासत की एक नई परिभाषा है। जैसा सोनिया गांधी ने साफ साफ कहा कि न तो वो राजनीति में आना चाहती थीं और न ही अपने बच्चों को इसमें लाना चाहती थीं, लेकिन हालात के हाथों वो भी मजबूर हुईं और उनके बच्चे भी। अब इसे दलदल कहिए या फिर पारिवारिक मजबूरी, पार्टी की नियति कहिए या कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी, वंशवाद के तमाम आरोपों के बावजूद कांग्रेस पार्टी के पास कोई विकल्प आज भी नहीं है। 
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गुजरात की अपनी सभाओं में राहुल ने कई बार कहा कि भाजपा ने उन्हें इतना मारा, इतना मारा कि वो और मजबूती से खड़े हो गए। उनका जिस तरह लगातार मजाक उड़ाया गया, उससे उनकी परिपक्वता और बढ़ी।

शायद तभी उन्होंने ये भी लगातार महसूस किया कि नफरत का जवाब नफरत नहीं हो सकता। इसीलिए अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भाजपा के लोगों को भी अपना भाई-बहन बताया और ये भी कह दिया कि भाजपा भले ही कांग्रेसमुक्त भारत की बात कहे, लेकिन हम भाजपामुक्त भारत की बात नहीं करते। ये उनके प्यार की राजनीति का पहल अध्याय है।
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मोदी क्यों सबके प्रिय नेता

राहुल जानते हैं कि कांग्रेस का संगठन आज किस हाल में है। उन्हें पता है कि भाजपा अगर आज इतनी ताकतवर हो गई है तो इसके पीछे संगठन की ताकत है। कांग्रेस में नेताओं की कमी को भी वो महसूस करते हैं।

पुराने कांग्रेसियों के बीच बीच में आने वाले बयान उनकी रणनीति और मेहनत पर पानी फेर देते हैं। सबको साथ लेने की उनकी कोशिश कई बार सियासी गुणाभाग में फेल हो जाती है, लेकिन ये बात भी तय है कि राहुल ने गुजरात से बहुत कुछ सीखा है। 

उन्होंने वहां जाकर ये महसूस किया है कि वहां भाजपा से नाराजगी होने के बावजूद मोदी क्यों सबके प्रिय नेता हैं और क्यों गुजरात आज भी मोदी के पीछे दीवाना है। एग्जिट पोल के नतीजों से कांग्रेसी एक बार फिर बेशक हताश हों लेकिन राहुल को गुजरात से जितना हासिल करना था उन्होंने कर लिया है।

राहुल के लिए पहले उत्तर प्रदेश और उसके बाद अब गुजरात एक बड़ी प्रयोगशाला रही है। जाहिर है, राजनीति कोई हंसी मजाक नहीं और न ही एक दिन में सीखी जाती है। लेकिन जनता का मिजाज, उसकी मजबूरियों और परेशानियों को उसके बीच जाकर जरूर महसूस किया जा सकता है। 

भारत की जटिल राजनीतिक व्यवस्था और जातिगत ताने बाने के साथ यहां की विविधता के बीच सियासी शतरंज की बाजी खेलना आसान नहीं और राहुल ने इस बात को शायद कुछ हद तक अब समझा है। 

प्यार की सियासत और वकालत उनकी रणनीति का एक अहम हिस्सा है। चुनौतियां तमाम हैं। पुरानी और नई पीढ़ी की सोच के टकराव भी हैं, लेकिन परंपरा को कायम रखने और संगठन को मजबूत करने की उनकी ये प्यार भरी रणनीति क्या गुल खिलाती है, इसका सबको इंतजार रहेगा।
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