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कुरुक्षेत्र: परदे के पीछे से प्रियंका गांधी के सामने आने के मायने

Wed, 23 Jan 2019 08:06 PM IST
Nilesh Kumar विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
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कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी - फोटो : Amar Ujala Graphics
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लंबे इंतजार के बाद आखिरकार कांग्रेस ने नेहरू गांधी खानदान के एक और सियासी वारिस प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतार दिया है। कांग्रेस का यह मास्टर स्ट्रोक उसी तरह का कदम है जैसा ठीक आम चुनाव से पहले 2004 में कांग्रेस ने राहुल गांधी को मैदान में उतार कर उठाया था। तब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का ये फैसला पार्टी के लिए शुभ साबित हुआ था और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी। क्या इस बार भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ये फैसला पार्टी की सत्ता वापसी का रास्ता साफ करेगा।

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तब भाजपा के महारथी अटल बिहारी वाजपेयी को उन सोनिया गांधी ने शिकस्त दी थी जो लिखा हुआ भाषण पढ़ती थीं और उनके खाते में तब तक कोई जीत दर्ज नहीं थी। अब भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा है लेकिन उसका मुकाबला उस राहुल गांधी से है जो पिछले चार साल से लगातार मोदी और भाजपा पर हमलावर हैं और जिनके खाते में पंजाब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की जीत, गुजरात, कर्नाटक की उपलब्धियां और गोवा की बढ़त दर्ज है।

सवाल है कि क्या कांग्रेस 2019 में 2004 का इतिहास दोहरा पाएगी। कांग्रेस समर्थकों और कार्यकर्ताओं को ऐसा ही लगता है। उन्हें लगता है कि राहुल गांधी का नया रूप और प्रियंका का करिश्मा मोदी शाह की जोड़ी पर भारी पड़ेगा। 
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कांग्रेस के प्रथम परिवार के भाई बहन का ये रक्षाबंधन उत्तर प्रदेश में सिर्फ भाजपा पर ही नहीं सपा बसपा गठबंधन पर भी भारी पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन होने के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि यूपी में कांग्रेस ऐसा कुछ करेगी कि लोग चौंक जाएंगे।

प्रियंका को मैदान में उतारकर राहुल ने इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया है। उनके नजदीकी सूत्र कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष अभी ऐसे ही कुछ और फैसले ले सकते हैं। प्रियंका के आने और ज्योतिरादित्य सिंधिया को उनके साथ उत्तर प्रदेश में सक्रिय करके कांग्रेस ने एक तरफ भाजपा के सवर्ण युवा और शहरी जनधार में सेंध लगाने का बड़ा दांव चला है । इससे भाजपा का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन अगर सवर्ण युवा और शहरी मतदाता कांग्रेस की तरफ घूमे तो मुस्लिम कब तक दूर रहेंगे।

और अगर ऐसा हुआ तो सपा बसपा गठबंधन का रास्ता भी कठिन हो सकता है। इसलिए सियासत में प्रियंका का प्रवेश कई नए गुल खिला सकता है। प्रियंका गांधी को पार्टी महासचिव बनाने के साथ ही उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी भी दी गई है जहां कांग्रेस सबसे कमजोर विकेट पर है और पूर्वांचल में ही मोदी और योगी के चुनाव क्षेत्र हैं। जाहिर है कांग्रेस ये चुनाव बचाव की मुद्रा में नहीं बल्कि आक्रमण की मुद्रा में लड़ने जा रही है।

इसे खुद राहुल गांधी ने भी साफ कर दिया है। प्रियंका को आगे लाने से भाजपा में जो खलबली है उसका संकेत उनके प्रवक्ताओं के इस बयान से मिलता है कि प्रियंका को लाकर कांग्रेस ने राहुल की विफलता स्वीकार कर ली है। जबकि तथ्य इसके उलट है। पहले पंजाब की जीत फिर गुजरात में भाजपा को टक्कर फिर कर्नाटक में सरकार बनाने में भाजपा को मात और हाल ही में पांच में से तीन बड़े उत्तर भारतीय राज्यों में कांग्रेस की जीत राहुल की सफलता की कहानी खुद ब खुद बयान कर रही है।

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परिवारवाद का आरोप तो नेहरू के जमाने से है

भाजपा का दूसरा आरोप परिवारवाद को लेकर है जो स्वाभाविक भी है। लेकिन कांग्रेस पर ये आरोप तो नेहरू के जमाने से है और अब तो आरोप लगाने वालों ने भी अपने अपने परिवारों को राजनीति में स्थापित कर दिया है। परिवरवाद के आरोपों के बावजूद न सिर्फ कांग्रेस बल्कि परिवारों के वर्चस्व वाले सभी दलों को उनके उनके प्रभाव क्षेत्र में जनता चुनती रही है।

जाहिर है परिवारवाद भारतीय जनमानस के लिए किसी भी दल को ख़ारिज करने वाला मुद्दा कभी नहीं रहा। इसलिए भाजपा इसे भुना पाएगी इसमें संदेह है। प्रियंका गांधी उस उत्तर प्रदेश में जहां 2009 लोकसभा चुनाव के अपवाद को छोड़कर कांग्रेस पिछले लंबे समय से हाशिए पर है, में क्या प्रभाव डाल सकेंगी ये एक सवाल है। किसी भी दल के लिए सबसे जरूरी है उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा होना।

निःसंदेह प्रियंका के महासचिव बनते ही न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह और खुशी है। अब ये उत्साहित कार्यकर्ता ज्यादा मेहनत और जोश से काम करेंगे जिसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। उत्तर प्रदेश में आज भले ही कांग्रेस सात विधायकों और दो सांसदों की पार्टी है लेकिन उसके समर्थक और कार्यकर्ता हर मोहल्ले और गांव में हैं। हर घर में कांग्रेस की बात करने वाले मौजूद हैं।

कांग्रेस का ये कदम उन्हें सक्रिय कर देगा। अभी तक कांग्रेस में राहुल के बाद कोई वैसा सेनापति नहीं था जैसा अमित शाह के रूप में नरेंद्र मोदी के पास है जो सारे सूत्र अपने नियंत्रण में रखते हुए त्वरित फैसले ले सके। प्रियंका के आने से वो कमी पूरी हो गई है।
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