400 किलोमीटर दूर से ही संदिग्ध गतिविधि को पहचान लेती है यह तकनीक
हवाई नियंत्रण एवं चेतावनी तकनीक खास तौर पर युद्ध क्षेत्र के लिए विकसित की गई रडार पिकेट तकनीक है। इस तकनीक के जरिए लंबी दूरी में भी लड़ाकू विमानों को आदेश (कमांड) दिया जा सकता है। उन्हें टारगेट को तबाह करने के लिए नियंत्रित किया जा सकता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है।
400 किलोमीटर दूर से ही संदिग्ध गतिविधि को पहचान लेती है यह तकनीक
हवाई चेतावनी और नियंत्रण तकनीक का इस्तेमाल जमीन पर सर्विलांस यानी की जासूसी के लिए भी होता है। इस तकनीक का इस्तेमाल रक्षात्मक एवं आक्रमक हवाई संचालन दोनों के लिए किया जाता है। इस तकनीक के जरिए 400 किलोमीटर दूर से ही किसी भी संदिग्ध हवाई गतिविधि की पहचान की जा सकती है। हवाई चेतावनी और नियंत्रण तकनीक वाले लड़ाकू विमान 30,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ सकते हैं और 312,000 किलोमीटर का क्षेत्र कवर कर सकते हैं। यह तकनीक किसी भी तरह के खतरे को पहले ही भांप लेती है और खतरे का डाटा, टारगेट की पहचान कर लेती है।
ट्रैक करना होता है मुश्किल
इस तकनीक पर आधारित लड़ाकू हवाई जहाजों को ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है। भारत ने मंगलवार को नियंत्रण रेखा पार कर इसी तकनीक के जरिए जैश-ए-मोहम्मद और दूसरे आतंकी शिविरों को तबाह किया। साल 2004 में भारत-रूस और इजराइल के बीच एयरबॉर्न अर्ली वॉर्निंग सिस्टम्स वाले फाल्कन विमानों के लिए त्रिपक्षीय समझौता हुआ था।