सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिलाने वाला संविधान का अनुच्छेद 370 अस्थायी प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने पिछले साल सरफेसी एक्ट केस में दिए निर्णय का भी हवाला दिया। जस्टिस एके गोयल और आरएफ नरीमन की पीठ ने कहा, ‘ये मुद्दा इसी अदालत के 2017 सरफेसी मामले में दिए निर्णय से जुड़ा है, जहां हम अनुच्छेद 370 की संक्षिप्त भूमिका के बावजूद उसके अस्थायी प्रावधान नहीं होने की बात मान चुके हैं।’
हो चुके हैं बदलाव भी
इसी प्रावधान के कारण 1965 तक वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री नहीं होता था। उनकी जगह सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री होते थे, जिसे बाद में बदला गया। पहले जम्मू-कश्मीर में जाने के लिए भारतीय नागरिक को अपने साथ पहचान-पत्र रखना जरूरी था। भारी विरोध के बाद इस प्रावधान को भी हटा दिया गया।
तीन राष्ट्र का सिद्घांत लागू करने की योजना है यह प्रावधान : श्यामा प्रसाद
भारतीय जन संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे। उन्होंने कहा था कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है। उनका मानना था कि यह अनुच्छेद शेख अब्दुल्ला के तीन राष्ट्रों के सिद्धांत को लागू करने की योजना है। मुखर्जी ने इसके खिलाफ भूख हड़ताल भी की थी। बिना पहचान पत्र जम्मू-कश्मीर में घुसने की कोशिश के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। 23 जून 1953 को हिरासत में ही उनकी मौत हो गई थी।
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रबंध बताया था। 27 नवंबर 1963 को उन्होंने लोकसभा में कहा था कि जल्द ही इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा। इससे पहले 1949 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध पर उन्होंने कहा था कि यह ‘घिसते घिसते घिस जाएगा’ यानी समय के साथ यह खुद ही खत्म हो जाएगा।
मैं कभी मंजूरी नहीं दूंगा : डॉ. अंबेडकर
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 370 को मंजूरी देने से साफ इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि यह नियम भारत की स्थिरता के लिए खतरनाक साबित होगा, इसलिए मैं कभी इसकी मंजूरी नहीं दूंगा।
प्रतिक्रिया
जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती ने कहा कि ‘अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई व्यवस्था स्वागत योग्य है। यह प्रावधान जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय अखंडता के साथ ही धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषायी अखंडता को भी सुरक्षा देता है।’