फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वन की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कहा- 2023 के कानून की वैधता पर ही होगी सुनवाई; राज्यों से क्या कहा?

Wed, 16 Sep 2026 05:54 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

वन की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता तक अपनी सुनवाई सीमित रखने की बात कही है। अलग-अलग जमीन के विवाद हाईकोर्ट देखेंगे। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से वन जैसी जमीन, अवर्गीकृत और सामुदायिक वन भूमि का रिकॉर्ड तैयार करने को कहा है। 2023 की नई परिभाषा और 1996 के टीएन गोदावर्मन फैसले में क्या अंतर है और इसका वन भूमि पर क्या असर पड़ सकता है?
विज्ञापन
सुुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

वन की परिभाषा को लेकर 2023 में किए गए बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई का दायरा साफ कर दिया। अदालत ने कहा कि वह फिलहाल 2023 के वन संरक्षण संशोधन कानून में ‘वन’ की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामले तक ही सीमित रहेगी। वहीं किसी खास जमीन के वन होने या न होने से जुड़े विवादों की सुनवाई हाईकोर्ट करेंगे। अदालत ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश भी दिया है, जिन्होंने अभी तक ऐसी समिति गठित नहीं की है।

सुप्रीम कोर्ट 2023 के कानून में क्या देखेगा?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेवानिवृत्त वन अधिकारी अशोक शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। अशोक शर्मा ने 2023 के कानून में वन की परिभाषा को चुनौती दी है। उनका कहना है कि नई परिभाषा से 1996 में टीएन गोदावर्मन मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय वन की समझ कमजोर हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह 1996 में दिए गए अपने फैसले में वन की परिभाषा को आधार बनाकर यह देखेगा कि संसद की ओर से तय नई परिभाषा में कोई विरोधाभास है या नहीं।

विज्ञापन


ये भी पढ़ें- ईपीएफओ कर्मचारी ध्यान दें: सरकार ने लिया ये बड़ा फैसला, पीएफ में क्या बदला और क्या नहीं; यहां जानें

1996 के फैसले से नई परिभाषा का क्या संबंध?

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि 1996 के टीएन गोदावर्मन फैसले के अनुसार ‘वन’ को उसके सामान्य या शब्दकोशीय अर्थ में समझा जाना चाहिए। उनका कहना है कि 2023 के बदलाव के बाद वन संरक्षण कानून में ऐसी जमीनों के बाहर होने की स्थिति बन सकती है जो वास्तव में वन जैसी हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज नहीं हैं। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि उजड़े हुए वन और निजी वन जैसी जमीनों को दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और इससे कुल वन क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से क्या कहा गया?

सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेषज्ञ पैनल गठित करने को कहा है, जिन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है। इन समितियों को जमीन का समेकित रिकॉर्ड तैयार करना होगा। इसमें वन जैसी जमीन, विशेषज्ञ समिति की ओर से चिन्हित क्षेत्र, अवर्गीकृत वन भूमि और सामुदायिक वन भूमि शामिल होगी। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया वन संरक्षण नियम, 2023 के नियम 16(1) के तहत पूरी की जानी चाहिए। इसी रिकॉर्ड के आधार पर यह तय करने में मदद मिलेगी कि 2023 के वन संरक्षण कानून के प्रावधान किन जमीनों पर लागू होंगे।

अलग-अलग जमीन के विवाद कौन सुलझाएगा?

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि किसी व्यक्तिगत जमीन के टुकड़े से जुड़े विवादों की सुनवाई हाईकोर्ट में होगी। अदालत ने तमिलनाडु में 59 एकड़ जमीन से जुड़े मामले को मद्रास हाईकोर्ट भेज दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि जमीन कृषि और बागान के लिए खरीदी गई थी, लेकिन 1922 की अधिसूचना के कारण वह अब भी निजी वन के रूप में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जमीन के पुराने इस्तेमाल, भौगोलिक स्थिति और दूसरे संबंधित तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट फैसला करेंगे।

1.99 लाख वर्ग किलोमीटर वन भूमि का मुद्दा क्या?

फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह दावा रखा गया था कि 2023 में बदली गई वन की परिभाषा के कारण करीब 1.99 लाख वर्ग किलोमीटर वन भूमि कानून के दायरे से बाहर हो सकती है और दूसरे कामों के लिए उपलब्ध हो सकती है। इसके बाद अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनके क्षेत्र की वन भूमि का विवरण केंद्र को देने को कहा था। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को वन जैसी जमीन, अवर्गीकृत वन भूमि और सामुदायिक वन भूमि की जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालने को कहा गया था। वहीं नवंबर 2023 में केंद्र ने अदालत से कहा था कि 1996 के टीएन गोदावर्मन फैसले में वन की परिभाषा के दायरे को कम करने का उसका कोई इरादा नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें