फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Sambhal Jama Masjid: क्या होती है केंद्र संरक्षित स्मारक, एएसआई ने क्यों कहा मस्जिद के स्वरूप से हुई छेड़छाड़?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Sat, 30 Nov 2024 08:15 PM IST

सार

Sambhal Jama Masjid: संभल में शाही जामा मस्जिद को लेकर जारी कानूनी विवाद में एएसआई ने अदालत में एक हलफनामा दाखिल किया है। एएसआई ने दावा किया कि केंद्रीय संरक्षित स्मारक के सर्वे की कोशिशों में मस्जिद कमेटी ने रुकावट डाली। वहीं मस्जिद की संरचना में बदलाव भी किया गया है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
संभल जामा मस्जिद विवाद - फोटो : AMAR UJALA
उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद को लेकर कानूनी विवाद लगातार चर्चा में बना हुआ है। जिला अदालत में शुक्रवार को शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपना जवाब पेश किया। एएसआई ने कहा कि विवादित स्थल 1920 से उनके संरक्षण में है। एएसआई द्वारा समय-समय पर केंद्रीय संरक्षित स्मारक के सर्वे की कोशिशों में मस्जिद कमेटी ने रुकावट डाली। इसके साथ ही मस्जिद की संरचना में बदलाव भी किया गया है।



आइये जानते हैं कि संभल में मस्जिद का कानूनी विवाद क्या है? एएसआई ने इस मामले में अदालत को क्या जवाब दिया है? केंद्रीय संरक्षित स्मारक क्या होती है? संरक्षित स्मारक के लिए क्या शर्तें होती हैं?
विज्ञापन

संभल जामा मस्जिद विवाद - फोटो : AMAR UJALA
उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद को लेकर कानूनी विवाद लगातार चर्चा में बना हुआ है। जिला अदालत में शुक्रवार को शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपना जवाब पेश किया। एएसआई ने कहा कि विवादित स्थल 1920 से उनके संरक्षण में है। एएसआई द्वारा समय-समय पर केंद्रीय संरक्षित स्मारक के सर्वे की कोशिशों में मस्जिद कमेटी ने रुकावट डाली। इसके साथ ही मस्जिद की संरचना में बदलाव भी किया गया है।



आइये जानते हैं कि संभल में मस्जिद का कानूनी विवाद क्या है? एएसआई ने इस मामले में अदालत को क्या जवाब दिया है? केंद्रीय संरक्षित स्मारक क्या होती है? संरक्षित स्मारक के लिए क्या शर्तें होती हैं?

संभल जामा मस्जिद विवाद - फोटो : AMAR UJALA
पहले जानते हैं संभल में मस्जिद का कानूनी विवाद क्या है?
दरअसल, 19 नवंबर को एक स्थानीय अदालत ने संभल के चंदौसी स्थित जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था। यह आदेश चंदौसी में संभल के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) आदित्य सिंह की अदालत ने पारित किया था। सर्वे का आदेश एक याचिका के बाद आया था जिसमें दावा किया गया था कि 1529 में मस्जिद बनाने के लिए एक मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था। याचिका 19 नवंबर को ही दायर की गई थी और उसी दिन न्यायाधीश ने एक अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त किया और उसे मस्जिद में प्रारंभिक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सर्वेक्षण की रिपोर्ट 29 नवंबर तक उसके समक्ष प्रस्तुत की जाए।

शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर मामले में संभल कोर्ट में कुल आठ याचिकाकर्ता हैं। इनमें वरिष्ठ वकील हरि शंकर जैन भी शामिल हैं, जो ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ विवाद में भी वकील हैं। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता हरिशंकर जैन की ओर से उनके बेटे विष्णु शंकर जैन ने वाद दाखिल किया है। संभल के कैला देवी मंदिर के महंत ऋषिराज गिरी भी इसमें चर्चित याचिकाकर्ता हैं। 

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन - फोटो : अमर उजाला
याचिका किसलिए है?
इस मामले पर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दावा किया कि संभल में हरिहर मंदिर था, जिसे तोड़कर जामा मस्जिद बना दी गई। जैन ने दावा किया कि इतिहास में ऐसा प्रमाण मिलता है कि 1529 में बाबर ने हरिहर मंदिर को एक मस्जिद में तब्दील कर दिया था। इसका जिक्र बाबरनामा में भी मिलता है। उन्होंने कहा कि कोर्ट के समक्ष भी यही बात कही गई है ताकि हरिहर मंदिर का सच सामने आ सके। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन कहा, 'ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु का कल्कि अवतार इसी जगह पर होगा। इसलिए यह स्थान पूरे समाज के लिए महत्वपूर्ण पूजा स्थल है।'

विवाद में एएसआई का क्या रुख है?
शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर मामले में शुक्रवार को जिला अदालत में सुनवाई हुई। इस दौरान मामले में प्रतिवादी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने भी अपना लिखित हलफनामा दाखिल किया। एएसआई की ओर से अधिवक्ता विष्णु शर्मा द्वारा जवाब प्रस्तुत किया गया। इस जवाब में जामा मस्जिद के केंद्रीय संरक्षित स्मारक होने का उल्लेख किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि वर्ष 1920 से विवादित स्थल एएसआई के संरक्षण में था। एएसआई द्वारा कहा गया है कि मस्जिद की संरचना में फेरबदल किया गया है। अवैध रूप से स्टील की रेलिंग लगा कर संरचना में बदलाव करने की एफआईआर भी कराई गई थी।

जवाब में यह भी कहा गया कि समय-समय पर एएसआई द्वारा विवादित स्थल का सर्वे किया गया और कई बार मस्जिद कमेटी ने एएसआई सर्वे की टीम को सर्वे करने से रोका। एएसआई ने अदालत को बताया कि स्मारक/मस्जिद की मौजूदा स्थिति ज्ञात नहीं है, क्योंकि मस्जिद समिति के सदस्यों ने एएसआई अधिकारियों को 'लंबे समय से' मस्जिद में प्रवेश करने से रोका है। हालांकि, एएसआई ने दावा किया कि कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद उनकी टीम ने जिला प्रशासन की सहायता से जब भी संभव हो, स्मारक का निरीक्षण किया।

हलफनामे में 25 जून 2024 की एक निरीक्षण रिपोर्ट भी शामिल है, जिसमें कहा गया कि केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारक की मूल संरचना कई स्थानों पर विकृत हो गई। रिपोर्ट में कहा गया कि मुख्य भाग के अंदरूनी हिस्से में चमकीले रंगों का भरपूर इस्तेमाल किया गया और स्मारक का समग्र स्वरूप काफी खराब हो गया।

क्या होता है केंद्रीय संरक्षित स्मारक?
भारत में प्राचीन स्मारकों के संरक्षण से जुड़ा एक कानून है जिसे 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958' के नाम से जाना जाता है। इसी अधिनियम में स्मारक की परिभाषा दी गई है जिसमें प्राचीन स्मारक के अवशेष या स्थल भी शामिल हैं। केंद्र सरकार ने 1958 के कानून के अंतर्गत 3600 से ज्यादा स्मारकों और स्थलों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया है जिनमें से एक संभल की जामा मस्जिद भी है। एएसआई के अनुसार, जब किसी प्राचीन स्मारक को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किए जाने पर उसे संरक्षित स्मारक कहा जाता है।

1958 के अधिनियम के तहत कम 100 साल से अस्तित्व में होने वाली कोई भी संरचना, निर्माण या स्मारक, या कोई टीला या दफनाने की जगह, या कोई गुफा, चट्टान की मूर्ति, शिलालेख या मोनोलिथ (जो ऐतिहासिक, पुरातात्विक या कलात्मक रुचि का हो) प्राचीन स्मारक हो सकती है। इतना ही नहीं, प्राचीन स्मारक के स्थल से सटा हुआ भूमि का वह हिस्सा जिसकी बाड़ लगाने या उसे ढंकने या अन्यथा ऐसे स्मारक को संरक्षित करने के लिए जरूरत हो सकती है और स्मारक तक पहुंचने के साधनों को भी प्राचीन स्मारक कहा जाता है। 

संरक्षित स्मारकों की सुरक्षा और रखरखाव कौन करता है?
वर्तमान में एएसआई अपने क्षेत्रीय कार्यालयों या सर्किलों और लघु सर्किलों के जरिए राष्ट्रीय महत्व के घोषित स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा और रखरखाव करता है। सभी केंद्रीय संरक्षित स्मारक या स्थल पर भी 1958 का अधिनियम लागू होता है। अधिनियम के तहत ही किसी स्मारक या स्थल के पास निर्माण या मरम्मत, जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण जैसी संबंधी गतिविधियों को भी नियंत्रित किया जाता है। इसके अलावा, स्मारक या स्थल से 100 मीटर की सीमा तक के क्षेत्र को निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया गया है और निषिद्ध सीमा से 200 मीटर की दूरी तक के क्षेत्र को विनियमित क्षेत्र घोषित किया गया है। निषिद्ध और विनियमित क्षेत्रों के भीतर निर्माण संबंधी गतिविधियों को करने के लिए, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण की सिफारिश पर सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना आवश्यक है।

किसी संरक्षित स्मारक के लिए क्या-क्या शर्तें होती हैं?
किसी भी केंद्रीय संरक्षित स्मारक या स्थल के निषिद्ध क्षेत्र में निर्माण या पुनर्निर्माण की अनुमति नहीं है। एएसआई की वेबसाइट के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, किसी संरक्षित स्मारक के भीतर, ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा, जिससे स्मारक के किसी भाग को नुकसान पहुंचे या पहुंचने की आशंका हो। किसी संरक्षित स्मारक को नष्ट करना, हटाना, क्षति पहुंचाना, बदलना, विरूपित करना, खतरे में डालना या उसका दुरुपयोग करना या संरक्षित स्मारक से किसी भी मूर्ति, नक्काशी, छवि, बेस रिलीफ, शिलालेख या अन्य समान वस्तु को हटाना दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में संज्ञेय अपराध माना जाएगा।

वहीं जो कोई संरक्षित स्मारक को नष्ट करेगा, हटाएगा, क्षति पहुंचाएगा, परिवर्तित करेगा, विरूपित करेगा या संकट में डालेगा, उसे तीन महीने तक के कारावास या पांच हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकेगा। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next