West Bengal Election: असम, केरल, बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव नतीजे भी नकद हस्तांतरण योजनाओं के असर की तस्वीर साफ करेंगे, जिनका खास फोकस महिलाओं और गरीब वर्ग पर रहा है। इन योजनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और राज्यों ने बड़े पैमाने पर सीधे खाते में पैसे भेजकर लाभार्थियों तक पहुंच बनाई है। पढ़िए रिपोर्ट-
असम, केरल, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु के चुनावी नतीजे नगद हस्तांतरण योजनाओं के असर का भी संकेत देंगे। खास तौर महिलाओं को केंद्र में रखकर तमाम राज्य कई लाभार्थी योजनाएं चला रहे हैं। महिला आरक्षण बिल के शोर में इन चुनावों में नगद हस्तांतरण योजनाओं का भी खासा प्रचार किया गया।
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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार युवा साथी योजना में शिक्षित बेरोजगार को 15,000 रुपये दे रही है। तमिलनाडु में द्रमुक सरकार ने कलाइगनर मगालिर उरिमाई थोगई योजना में 1.31 करोड़ महिलाओं के खाते में 5,000-5,000 रुपये भेजे। एसबीआई की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में नगद हस्तांतरण के मामले में झारखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल शीर्ष तीन राज्यों में हैं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, असम और ओडिशा भी बड़े नगद हस्तांतरण कार्यक्रम चला रहे हैं। नगद हस्तांतरण में 2018-19 से 2025-26 (बजट अनुमान) के दौरान 53.6 फीसदी की भारी वृद्धि देखी गई है जो 2025-26 में 1.96 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
वित्त वर्ष 2026 को समाप्त होने वाली 6 वर्ष की अवधि में कर्नाटक में नगद हस्तांतरण में 94 गुना, झारखंड में 47 गुना और पश्चिम बंगाल में 24 गुना की चौंकाने वाली वृद्धि हुई है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, इस तरह की योजनाओं ने राज्यों को जीडीपी के लगभग 2.4 प्रतिशत के स्तर पर पूंजीगत व्यय बनाए रखने में मदद की। 16वें वित्त आयोग के अनुसार, नगद अंतरण ऐसी सब्सिडी हैं जो किसी विशेष क्षेत्र से संबद्ध नहीं होतीं। जन धन, आधार, मोबाइल प्रणाली के कारण इन योजनाओं का विस्तार हुआ है।
लक्ष्मी भंडार और लाडली बहना योजना खासी चर्चित
प. बंगाल में लक्ष्मी भंडार योजना चल रही है तो मध्यप्रदेश में लाडली बहना। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री माझी लड़की बहिन योजना खासी कामयाब है। हरियाणा में दीन दयाल लाडो लक्ष्मी योजना, बिहार में मुख्यमंत्री रोजगार योजना, झारखंड में मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना भी खासी चर्चित रही हैं। इन सब योजनाओं से जहां लाखों गरीब लोगों को फायदा हुआ, वहीं सत्ताधारी दल को इन योजनाओं को लागू करने व अपने पक्ष में भुनाने से भी चुनावी बढ़त हासिल हुई।