पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले वाम राजनीति में एक अहम संकेत सामने आया है। माकपा के दो वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम और सुजन चक्रवर्ती के इस बार चुनाव नहीं लड़ने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी की राज्य सचिवालय बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जहां दोनों नेताओं ने चुनाव लड़ने की बजाय संगठन और प्रचार पर ध्यान देने की इच्छा जताई।
बैठक में मौजूद पार्टी नेताओं के अनुसार दोनों वरिष्ठ नेताओं से इस बारे में राय मांगी गई थी। बताया गया कि मोहम्मद सलीम और सुजन चक्रवर्ती ने संकेत दिया कि वे पूरे राज्य में घूमकर पार्टी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करना चाहते हैं। उनका मानना है कि संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए राज्यभर में प्रचार अभियान चलाना ज्यादा जरूरी है।
माकपा के राज्य सचिव चुनाव क्यों नहीं लड़ते?
माकपा में एक परंपरा रही है कि पार्टी के राज्य सचिव आमतौर पर चुनाव नहीं लड़ते हैं। यह परंपरा पश्चिम बंगाल में पार्टी के पहले राज्य सचिव प्रमोद दासगुप्ता के समय से चली आ रही है। जब 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर माकपा का गठन हुआ था, तब से संगठनात्मक जिम्मेदारी संभालने वाले कई नेताओं ने चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी।
ये भी पढ़ें- US: ईरान युद्ध के बीच हांफने लगा अमेरिका, तेल पर मंडराते संकट को दूर करने के लिए ट्रंप ने उठाया ये बड़ा कदम
मोहम्मद सलीम का चुनावी अनुभव कैसा रहा?
मोहम्मद सलीम ने हालांकि इस परंपरा से अलग होकर पहले चुनाव लड़ा था। वे 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बने थे। लेकिन दोनों चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद पार्टी के भीतर यह चर्चा भी तेज हुई कि उन्हें संगठन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
सुजन चक्रवर्ती को चुनाव लड़ाने पर क्यों हुआ जोर?
बैठक में पार्टी के कुछ नेताओं ने सुजन चक्रवर्ती से चुनाव लड़ने का आग्रह भी किया था। वे पश्चिम बंगाल विधानसभा में वाम दलों के नेता रह चुके हैं और लंबे समय से पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि वे चुनाव लड़ने के बजाय राज्यभर में घूमकर पार्टी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करना ज्यादा पसंद करेंगे।
इस बार किन नेताओं को टिकट मिलने की संभावना है?
पार्टी सूत्रों के मुताबिक फिलहाल यह तय किया गया है कि राज्य सचिवालय के केवल दो सदस्य ही इस बार चुनाव लड़ेंगे। इनमें मीनाक्षी मुखर्जी और पलाश दास के नाम सामने आए हैं। दोनों नेताओं को पार्टी के युवा और सक्रिय चेहरों में माना जाता है।
चुनावी रणनीति पर क्या असर पड़ेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वरिष्ठ नेताओं के चुनाव न लड़ने का फैसला माकपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इससे पार्टी को पूरे राज्य में प्रचार पर ज्यादा ध्यान देने का मौका मिलेगा। साथ ही संगठन को मजबूत करने और नए चेहरों को आगे लाने की कोशिश भी की जा सकती है।
अन्य वीडियो-