वैसे बंगाल का सियासी मिजाज बड़ा ही स्थिर रहा है। यहां की जनता ने 34 साल तक वाम दलों को राज करने दिया। इसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने अपने 10 साल पूरे कर लिए। मगर इस बार के विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल के लिए चुनावी राह आसान नहीं है। यह बात दीदी भी समझ रही हैं, इसलिए तो दूसरे चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले ममता ने 15 नेताओं को पत्र लिखकर भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की अपील की थी। इससे पहले गोत्र का मुद्दा विवादों में आया था, जिसको लेकर खूब बयानबाजी हुई। खैर, बंगाल में सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो दो मई को ही पता चलेगा, जब नतीजे आ जाएंगे। साल 2011 का चुनाव इसका उदाहरण है, जब वाम दलों ने सत्ता गंवाई थी, तब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट नहीं बचा पाए थे।
साल 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी के सामने कोई चुनौती नहीं थी। टीएमसी ने 294 सदस्यीय विधानसभा की 211 सीटें जीती थीं। पिछले चुनाव में भाजपा को केवल तीन सीटें मिली थीं। इस बार की तस्वीर बिल्कुल अलग है। टीएमसी और भाजपा में जोरदार टक्कर है। वहीं, साल 2009 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट जीतने वाली भाजपा ने 2014 में दो सीटें जीतीं और 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 में से 18 सीटें जीतकर यह संकेत दे दिए कि बंगाल में भाजपा अपनी पैठ मजबूत कर रही है।
इस बार के विधानसभा चुनाव में दीदी की राह कठिन मालूम पड़ने का सबसे बड़ा कारण है टीएमसी नेताओं का पलायन। एक समय में ममता के खास रहे दिग्गज नेताओं ने टीएमसी को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। टीएमसी से भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं की फेहरिस्त लंबी है। ममता के खास रहे सुवेंदु इसबार खुद नंदीग्राम सीट पर उनके सामने हैं। दोनों के बीच का मुकाबला कांटे की टक्कर का माना जा रहा है। सुवेंदु को पूरा यकीन है कि वह नंदीग्राम 'दीदी' को हरा देंगे।
बहरहाल, एक बात को साफ है कि बंगाल की जनता ने जिसपर भी भरोसा किया, दिल खोलकर किया। जिसको भी सत्ता सौंपी, लंबे समय के लिए सौंपी है। दो मई को साफ हो जाएगा की बंगाल की जनता इस बार किसे राजगद्दी सौंपती है। दीदी हैट्रिक लगाएंगी या बंगाल में भाजपा का उदय होगा। बता दें कि राज्य में 294 सीटों के लिए आठ चरणों में मतदान है।