फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सियासत: चिट्ठी और गोत्र, क्या 'चक्रव्यूह' में फंस गईं दीदी, 2016 से हालात कितने अलग?

Fri, 02 Apr 2021 10:07 AM IST
मुकेश कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता

सार

बंगाल में इस बार की तस्वीर साल 2016 के विधानसभा चुनाव से काफी अलग नजर आ रही है। सत्ताधारी दल के लिए चुनावी राह आसान नहीं है। वहीं भाजपा का कहना है कि वह इस बार बंगाल में 200 से ज्यादा सीटें जीतेगी।
विज्ञापन
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बंगाल में इस बार की तस्वीर साल 2016 के विधानसभा चुनाव से काफी अलग नजर आ रही है। राज्य में दो चरणों का मतदान हो चुका है और तीसरे चरण का मतदान छह अप्रैल को है। पहले व दूसरे चरण में क्रमशः 79.79 और 80.43 वोटिंग हुई। सत्ताधारी टीएमसी एक बार फिर हैट्रिक लगाने का दावा कर रही है वहीं भाजपा का कहना है कि वह इस बार बंगाल में 200 से ज्यादा सीटें जीतेगी। 

विज्ञापन

 

सत्ताधारी दल के लिए चुनावी राह आसान नहीं

वैसे बंगाल का सियासी मिजाज बड़ा ही स्थिर रहा है। यहां की जनता ने 34 साल तक वाम दलों को राज करने दिया। इसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने अपने 10 साल पूरे कर लिए। मगर इस बार के विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल के लिए चुनावी राह आसान नहीं है। यह बात दीदी भी समझ रही हैं, इसलिए तो दूसरे चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले ममता ने 15 नेताओं को पत्र लिखकर भाजपा के खिलाफ एकजुट होने की अपील की थी। इससे पहले गोत्र का मुद्दा विवादों में आया था, जिसको लेकर खूब बयानबाजी हुई। खैर, बंगाल में सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो दो मई को ही पता चलेगा, जब नतीजे आ जाएंगे। साल 2011 का चुनाव इसका उदाहरण है, जब वाम दलों ने सत्ता गंवाई थी, तब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। 

2016 में टीएमसी के सामने कोई चुनौती नहीं थी

साल 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी के सामने कोई चुनौती नहीं थी। टीएमसी ने 294 सदस्यीय विधानसभा की 211 सीटें जीती थीं। पिछले चुनाव में भाजपा को केवल तीन सीटें मिली थीं। इस बार की तस्वीर बिल्कुल अलग है। टीएमसी और भाजपा में जोरदार टक्कर है। वहीं, साल 2009 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट जीतने वाली भाजपा ने 2014 में दो सीटें जीतीं और 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 में से 18 सीटें जीतकर यह संकेत दे दिए कि बंगाल में भाजपा अपनी पैठ मजबूत कर रही है। 

दीदी की राह कठिन का मुख्य कारण टीएमसी नेताओं का पलायन

इस बार के विधानसभा चुनाव में दीदी की राह कठिन मालूम पड़ने का सबसे बड़ा कारण है टीएमसी नेताओं का पलायन। एक समय में ममता के खास रहे दिग्गज नेताओं ने टीएमसी को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। टीएमसी से भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं की फेहरिस्त लंबी है। ममता के खास रहे सुवेंदु इसबार खुद नंदीग्राम सीट पर उनके सामने हैं। दोनों के बीच का मुकाबला कांटे की टक्कर का माना जा रहा है। सुवेंदु को पूरा यकीन है कि वह नंदीग्राम 'दीदी' को हरा देंगे।
विज्ञापन

बंगाल की जनता ने जिसपर भी भरोसा किया, दिल खोलकर किया

बहरहाल, एक बात को साफ है कि बंगाल की जनता ने जिसपर भी भरोसा किया, दिल खोलकर किया। जिसको भी सत्ता सौंपी, लंबे समय के लिए सौंपी है। दो मई को साफ हो जाएगा की बंगाल की जनता इस बार किसे राजगद्दी सौंपती है। दीदी हैट्रिक लगाएंगी या बंगाल में भाजपा का उदय होगा। बता दें कि राज्य में 294 सीटों के लिए आठ चरणों में मतदान है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें