डायमंड हार्बर (दक्षिण 24 परगना)। पश्चिम बंगाल की सत्ता का रास्ता हुगली नदी के किनारों से नहीं, बल्कि दक्षिण 24 परगना की उन सियासी पगडंडियों से होकर गुजरता है, जिस पर फिलहाल तृणमूल कांग्रेस के दूसरे सबसे कद्दावर नेता अभिषेक बनर्जी का एकछत्र राज है। बंगाल की सियासत का यह वह अखाड़ा है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तिलिस्म और अभिषेक के रसूख को चुनौती दिए बिना नबन्ना (राज्य सचिवालय) की कुर्सी तक पहुंचना नामुमकिन है। इस बार इस अभेद्य किले में देश के गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक बिसात और अभिषेक बनर्जी की इस्पाती पकड़ के बीच सीधी और करारी टक्कर है।
दक्षिण 24 परगना में लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं है। यह साख, रणनीति और संगठन की टक्कर है। एक तरफ शाह की रणनीतिक आक्रामकता, दूसरी तरफ अभिषेक का जमीनी किला है। बंगाल का अगला सियासी सरगना कौन होगा, इसका फैसला यहीं से लिखा जाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बंगाल का जो चुनावी खाका खींचा है, उसमें दक्षिण 24 परगना सबसे अहम अध्याय है। रणनीतिकारों का स्पष्ट मानना है कि अगर पश्चिम बंगाल में सरकार बनानी है, तो इस जिले की 31 विधानसभा सीटों में से भाजपा को हर हाल में दहाई का आंकड़ा छूना ही होगा। बिना इस किले में सेंध लगाए बंगाल फतह का सपना अधूरा ही रहेगा।
यही वजह है कि अमित शाह ने खुद इस जिले की कमान और निगरानी अपने हाथों में ले ली है। जमीनी संगठन की कमजोरी को पाटने और बंगाली मतदाताओं खासकर मतुआ और शरणार्थी समुदायों को साधने के लिए त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब को यहां विशेष तौर पर मोर्चे पर लगाया गया है। दूसरी तरफ, डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी ने इस पूरे इलाके को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बना रखा है। जादवपुर, मथुरापुर और जयनगर जैसी लोकसभा सीटों और उनके अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में राज्य सरकार की योजनाओं का पैसा सीधे जमीन पर उतरा है। अभिषेक का जमीनी प्रबंधन इतना तगड़ा है कि मतदान केंद्र (बूथ) स्तर पर उनकी टीम बिना किसी शोर-शराबे के काम करती है। इस इलाके में सत्ता पक्ष का आत्मविश्वास और सियासी तपिश कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा अभिषेक बनर्जी के उस तीखे हमले से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने सीधे अमित शाह को चुनौती देते हुए कहा है कि '4 मई के बाद उन्हें यहां रुकने नहीं दिया जाएगा।' यह महज बयान नहीं, बल्कि अपनी जमीन पर अपने रसूख का खुला एलान है।
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पुनरीक्षण का पेच व मुस्लिम मतदाताओं का समीकरण
इस जिले की लगभग सभी सीटों पर 20 से 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जो तृणमूल की सबसे बड़ी ढाल हैं। हालांकि, हाल ही में हुए मतदाता सूची पुनरीक्षण ने दोनों खेमों में हलचल पैदा की थी, जब चार लाख 90 हजार नए मतदाताओं के नाम सामने आए और सघन जांच के बाद सिर्फ 40 फीसदी नाम ही वैध पाए गए, तो सत्ता पक्ष को लगा कि कहीं, उसके समर्थकों को निशाना तो नहीं बनाया गया। हालांकि मजबूत संगठन ने सुनिश्चित किया कि स्थिति को तुरंत संभाल लिया जाए।
जीत हार का अंतर और भाजपा की उम्मीदें
- पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजे तृणमूल के वर्चस्व की कहानी कहते हैं, लेकिन भाजपा उन पन्नों को पढ़ रही है, जहां फासला कम था।
- 31 में से 30 सीटों पर तृणमूल का कब्जा है, जबकि एक सीट भांगड़ पर आईएसएफ के नौशाद सिद्दीकी ने जीत दर्ज की थी। वामदलों और कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया था। यहां बस भाजपा के लिए उम्मीद की किरण यह है कि इस दो-ध्रुवीय चुनाव में वह ज्यादातर सीटों पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरी।
- चुनाव आयोग के आंकड़ों पर गौर करें तो डायमंड हार्बर, जयनगर और कैनिंग से सटी कुछ शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर भाजपा का मत प्रतिशत 30 से 35 फीसदी के बीच रहा था।
- गोसाबा उपचुनाव, काकद्वीप और मगरहाट जैसी सीटों पर भले ही तृणमूल जीती, लेकिन विपक्ष ने अपना जनाधार काफी हद तक सहेजे रखा।
नेतृत्व की असली अग्निपरीक्षा
- सियासी जानकारों का साफ मानना है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और अमित शाह की असली परीक्षा यहीं है। लहर के सहारे उत्तर बंगाल या जंगलमहल में सीटें निकालना एक बात है, लेकिन अभिषेक बनर्जी के अपने गढ़ में, जहां उनका इस्पाती तंत्र चौबीसों घंटे सक्रिय रहता है, वहां कमल खिलाना दूसरी बात।
- अगर बिप्लब देब और शाह की रणनीति काम कर गई और भाजपा यहां खाता खोलते हुए दहाई के करीब पहुंच गई, तो बंगाल की सियासत में एक बड़ा उलटफेर हो जाएगा। लेकिन अगर अभिषेक का किला अभेद्य रहा तो सत्ता की चाबी फिर उन्हीं के हाथ में रहेगी। लड़ाई अब सिर्फ सीटों की नहीं, साख की है।