पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से सत्ता की धुरी रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में एकतरफा प्रदर्शन किया था, लेकिन 2026 के चुनावी मोड़ पर पहुंचते-पहुंचते हवा इस बार एकतरफा तो नहीं है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), स्थानीय असंतोष और नए राजनीतिक विकल्पों ने इस पक्के वोट बैंक में हलचल पैदा कर दी है।
एसआईआर के बाद लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटने की चर्चा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हुए हैं। इनमें से 34 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि राज्य में उनकी जनसंख्या का हिस्सा 27 फीसदी है। मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी में 2.5 से 3 फीसदी तक की कमी का असर दिख रहा है। 2021 में तृणमूल और भाजपा के बीच वोट शेयर का अंतर करीब 8 फीसदी था। यदि तृणमूल के इस कोर सपोर्ट में 3 फीसदी की गिरावट आती है और एंटी-इन्कंबेंसी भी जुड़ती है, तो कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है।
इसे ऐसे समझें कि 2021 में तृणमूल ने 37 सीटें 5 प्रतिशत से कम के अंतर से जीती थीं। ऐसे में, यदि किसी सीट पर 10 से 20 हजार मुस्लिम वोट कम होते हैं, तो वह सीधे तौर पर तृणमूल की जीत के अंतर पर चोट होगी। जैसे नादिया की करीमपुर (करीब 12 हजार), मुर्शिदाबाद की डोमकल (करीब 47 हजार) और कई अन्य सीटें, जहां 5 फीसदी से कम अंतर रहा था। भवानीपुर जैसी सीट, जहां से ममता बनर्जी खुद चुनाव लड़ चुकी हैं, वहां भी मतदाता सूची में 40 हजार से ज्यादा वोट कटे हैं। इस बदलाव को लेकर राजनीतिक हलचल है।
उत्तर बंगाल : दादा और स्थानीय अस्मिता
मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। यहां अधीर रंजन चौधरी का प्रभाव अब भी कायम है। मुर्शिदाबाद में मछली बेचने वाले मोहम्मद करीब मौला कहते हैं कि हमारे लिए अधीर दादा बेहतर हैं। वह खड़े होते हैं, हमारी बात करते हैं। वहीं, शिक्षक अनवर हुसैन विश्वास का नजरिया मिश्रित है और वह कहते हैं कि प्रदेश के लिए तो ममता बनर्जी को जिताना है, लेकिन हमारे यहां बहरामपुर में दादा का रहना जरूरी है। वैसे इस इलाके में मौसम नूर का भी प्रभाव साफ दिखता है। यह दोहरी सोच बताती है कि राज्य और स्थानीय स्तर पर वोटिंग का पैटर्न अलग-अलग हो सकता है।
भांगड़ : बदलते मिजाज की जमीनी तस्वीर
- दक्षिण 24 परगना की भांगड़ सीट इस बदलाव का सबसे जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है। यहां से नौशाद सिद्दीकी की जीत ने 2021 में ही संकेत दे दिया था कि मुस्लिम वोट अब पूरी तरह एक दिशा में नहीं बह रहा। जमीनी हकीकत इसे और स्पष्ट करती है। दक्षिण के भांगड़ से निकलकर नौशाद सिद्दीकी की आईएसएफ अब मालदा, नादिया और उत्तर 24 परगना की कम से कम 20-25 सीटों पर प्रभावी हो गई है।
- वाम मोर्चे के साथ उनका सीट-शेयरिंग समझौता मुस्लिम युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है। भांगड़ में तृणमूल समर्थक नुरुल अमीन नस्कर और उनके मित्र अब्दुल करीम हक से अमर उजाला ने बात की। दोनों मानते हैं कि नौशाद सिद्दीकी का प्रभाव यहां बढ़ा है, इसे नकारा नहीं जा सकता।
- सब्जी बेचने वाली आयशा खातून मंडल खुलकर दीदी के समर्थन में बोलती हैं, लेकिन साथ ही जोड़ती हैं कि वोट तो वहीं करेंगे, जहां पूरा समाज जाएगा। यानी व्यक्तिगत पसंद और सामुदायिक रुझान, दोनों के बीच संतुलन साधने की ये कोशिश तृणमूल के लिए अच्छा संकेत नहीं।
डर और विकल्प के बीच वोटर
मौलाना अब्दुल रहमान शेख कहते हैं कि सबसे बड़ा खतरा भाजपा है, उसे दीदी ही दूर रख सकती हैं। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि अब मुसलमानों में भी कुछ लोग अलग तरह से सोचने लगे हैं। यानी भाजपा का डर अब भी एकजुटता का कारक है, लेकिन विकल्पों की तलाश भी शुरू हो चुकी है।
हुमायूं कबीर : अलग राह, वही सवाल
कभी तृणमूल में रहे हुमायूं कबीर अब अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं। लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि मुस्लिम समाज को केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि वास्तविक हिस्सेदारी चाहिए। कबीर का यह बयान कि ममता बनर्जी, ईद की नमाज पढ़ने से मुसलमानों का पेट नहीं भरता। उन्हें मजबूत करना तो दूर, जो दो मुस्लिम मंत्री फिरहात हकीम और सिदिकुल्ला चौधरी हैं, उनके पास भी कोई शक्ति नहीं है। उनकी यह लाइन विपक्ष को तृणमूल के खिलाफ एक वैचारिक आधार तैयार कर रही है।
दरार दिख रही, दिशा तय होना बाकी
भांगड़ की गलियों से लेकर मुर्शिदाबाद के बाजारों तक जो संकेत मिल रहे हैं, वे साफ बताते हैं कि मुस्लिम वोट बैंक अब पहले जैसा एकमुश्त नहीं रहा। अब यह वोटर संतुलन साध रहा है, राज्य स्तर पर स्थिरता और स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व के बीच। 2026 का चुनाव इसी बदलते मिजाज की असली परीक्षा होगा।