अपने घर में रिफ्यूजी बनकर कौन रहना चाहता है? डर तो लगता है, लेकिन अब खुद के लिए आवाज नहीं उठाई, तो यहां रहना मुश्किल हो जाएगा। हुगली के चंदनगर में 23 साल की तान्या जब यह बात कहती है, तो उसकी आंखों में भविष्य को लेकर अनजाना भय और वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ गहरी टीस साफ दिखती है। यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि उस हुगली जिले का मिजाज है, जहां से कभी ममता बनर्जी ने वामपंथ के खात्मे की पटकथा लिखी थी। 18 विधानसभा सीटों वाले इस जिले में आज हवा का रुख बदला हुआ है। कोलकाता से सटे इस जिले, जहां गंगा की सहायक नदी भागीरथी (हुगली) बहती है, राजनीतिक रूप से काफी अशांत दिख रहा है।
आरजी कर और संदेशखाली की घटनाओं को लेकर गुस्सा
तान्या के साथ खड़ी महुआ को मुख्यमंत्री के उन बयानों से सख्त एतराज है, जो सुरक्षा देने के बजाय पाबंदियां थोपते हैं। महुआ तल्ख लहजे में पूछती है कि हमारे पैरेंट्स हमें नहीं रोकते, तो 8 बजे के बाद बाहर न निकलने की सलाह देने वाली सीएम कौन होती हैं? हमें सलाह नहीं, सुरक्षा चाहिए। तान्या का गुस्सा आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना और संदेशखाली को लेकर है। वह पूछती हैं कि 300-400 लोगों को अपना घर छोड़कर जाना पड़ा ये कैसे बर्दाश्त करें?
हुगली की श्रीरामपुर लोकसभा सीट से सांसद कल्याण बनर्जी तृणमूल के प्रचार में जुटे हैं। पर, संसद में ऑपरेशन सिंदूर की चर्चा के दौरान अजीब आवाजें निकालने, मिमिक्री करने और अपनी ही सांसद महुआ मोइत्रा से उलझने वाले कल्याण का व्यवहार हुगली की गलियों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
बच्चों की जुबानी, घरों में घुसी राजनीति
हुगली की एक गली में मिले 8वीं कक्षा के छात्र आदित्य से जब समय पूछा, तो बात राजनीति तक जा पहुंची। यह बच्चा मोदी और ममता दोनों को पहचानता है। मासूमियत से कहता है कि मुझे मोदी पसंद हैं, क्योंकि पापा कहते हैं कि मोदी पैसा देते हैं, जिससे घर चलता है। आदित्य भले ही वोटर न हो, पर उसकी बातें तस्दीक करती हैं कि केंद्रीय योजनाओं का प्रभाव और घर के भीतर होने वाली चर्चाएं किस तरह आने वाली पीढ़ी के जहन में पैठ बना रही हैं।
खामोश मुस्कुराहट में छिपे हैं संदेश
- हुगली के घाटों पर शाम 7 बजे युवाओं की टोली गिटार बजा रही है। बांग्ला गीत गा रही। बातचीत होती है, लेकिन जैसे ही राजनीति का जिक्र आता है, माहौल में अजीब सा भय घुल जाता है। अर्णब कुंडु और संखदीप जैसे युवा किसी भी नेता का नाम लेने से बचते हैं। ये देश की बात करते हैं, लेकिन बंगाल की राजनीति पर बात छिड़ते ही इधर-उधर देखने लगते हैं।
- यहीं बैठीं सुमोना, शिवानी और काकोली नाम की लड़कियों से जब शासन-प्रशासन को लेकर कुरेदा गया, तो उन्होंने कुछ कहा तो नहीं। बस एक मुस्कुराहट बिखेर दी। एक ने धीरे से कहा, हमारी मुस्कुराहट को ही आप जवाब समझ लीजिए।
- साफ है कि बंगाल की राजनीति के हिंसक चरित्र को देखते हुए यहा लोग कैमरा देखकर चुप हो जाते हैं, लेकिन उनके संकेत और मुस्कुराहट बता रहे हैं कि हुगली की जमीन का मिजाज बदला हुआ है।
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आधे से ज्यादा टिकट काटकर भी तृणमूल बेचैन
हुगली की 18 सीटों में से तृणमूल के पास 14 और 4 भाजपा के पास हैं। ममता ने हवा का रुख भांपते हुए इस बार 10 प्रत्याशी बदल दिए हैं, लेकिन दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है।
भीतरघात का खतरा
वर्तमान विधायक नए प्रत्याशियों का साथ देने के बजाय विरोध में हैं। चुरचुरा से पूर्व विधायक असित मजूमदार तो खुलकर कह रहे हैं कि वे पार्टी प्रत्याशी के प्रचार में नहीं जाएंगे।
तीसरा कोण
मुस्लिम बहुल पांडवा सीट पर सीपीएम के तीन बार विधायक रहे अमजद अली मजबूती से लड़ते हैं, तो यहां बड़ा उलटफेर तय है।
बदले समीकरण
चुरचुरा, चंदन नगर, सप्तग्राम, बालागढ़ और श्रीरामपुर में भाजपा तृणमूल के सामने कड़ी चुनौती पेश कर रही है।