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बंगाली रण: इस चुनाव में जो हुआ वो पहले कभी नहीं हुआ, इन मुद्दों ने बिगाड़ा सामाजिक ताना-बाना, समुदायों में खींची लकीर

Sun, 25 Apr 2021 11:02 AM IST
दीप्ति मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता

सार

आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल की राजनीति के कई रंग देखे गए हैं। बंगाल में लोगों ने राजनीतिक विचारधाराओं का खूनी टकराव, भष्टाचार और औद्योगिक घरानों के खिलाफ आंदोलन देखे हैं, लेकिन पहली बार ‘बंगाली प्राइड’ को तार-तार होते हुए देखा है। पहली बार मुस्लिम तुष्टिकरण और भीतरी बाहरी के मुद्दों ने सामाजिक ताना बाना बिगाड़ दिया है। 
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Mamata banerjee, PM Narendra Modi - फोटो : Amar ujala
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आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल की राजनीति के कई रंग देखे गए हैं। बंगाल में लोगों ने राजनीतिक विचारधाराओं का खूनी टकराव, भष्टाचार और औद्योगिक घरानों के खिलाफ आंदोलन देखे हैं, लेकिन पहली बार ‘बंगाली प्राइड’ को तार-तार होते हुए देखा है। पहली बार मुस्लिम तुष्टिकरण और भीतरी बाहरी के मुद्दों ने सामाजिक ताना बाना बिगाड़ दिया है।

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बंगाली प्राइड यानी जाति-धर्म और राज्य की सीमाओं से परे प्रबुद्धता और सांस्कृतिक समृद्धता के सूत्र से जुड़ी आबादी। बंगाल के बड़े शहरों से लेकर कस्बों और गावों तक पसरी इस भावना में न बाहरी-भीतरी का भेद रहा है और न हिंदू-मुस्लिम का फर्क, लेकिन इस विधानसभा चुनाव में ये बंगाली प्राइड भी छिन्नभिन्न हो गया।

इन मुद्दों ने डाली दरार
राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा और तृणमूल के इस चुनावी मुकाबले में नुकसान बंगाल की संस्कृति को हुआ है। ममता बनर्जी ने भाजपा को निशाना बनाने के लिए बाहरी और भीतरी का मुद्दा उठाया। बाद में उन्होंने सफाई भी दी कि बाहरी का मतलब सिर्फ भाजपा की चुनावी भीड़ है, लेकिन इस मुद्दे ने राज्य में सालों से रह रहे, बंगाली बोलने वाले और यहां की संस्कृति में रमे गैर-बंगालियों और बंगालियों के बीच अजीब से दरार पैदा कर दी। वहीं भाजपा के बार-बार मुस्लिम तुष्टिकरण का मुद्दा उठाने से राज्य की मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय बंगाली आबादी के मन में ये सवाल जरूर उठने लगे हैं कि कहीं उनके रोजगार पर संकट का कारण तृणमूल का अल्पसंख्यक प्रेम तो नहीं है।
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उच्च वर्ग ने भी की जमकर वोटिंग 
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस चुनाव में पहली बार लोगों के बीच हिंदू-मुस्लिम को अलग-अलग देखने की भावना आई है। जो बातें भीतर थीं, वह खुलकर सामने आ गई हैं। इस चुनाव में एक सार्थक बदलाव भी हुआ है। लेफ्ट फ्रंट के समय से ही चुनाव के दिन उच्च वर्ग खुद को वोटिंग से दूरी रखता था। तृणमूल के दौर में भी यही क्रम जारी रहा। यह वर्ग मतदान के दिन छुट्टी मानकर चलता था, लेकिन इस बार केंद्रीय बलों की सक्रियता के चलते यह वर्ग भी वोटिंग के लिए निकला। यहां राजनीतिक दलों में यह भावना हावी रही है कि यह उच्च वर्ग हमेशा सत्ता विरोधी लहर फैक्टर का मुख्य कारक रहा है।

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मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा से मुस्लिम वर्ग नाराज 

बंगाल से ताल्लुक रखने वाले एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने कहा कि मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा से एक वर्ग नाराज है। ऐसी मान्यता हो गई है कि कहीं हिंदू और मुस्लिम के बीच विवाद हो तो सत्तासीन दल की शह पर प्रशासन मुस्लिमों का पक्ष लेगा। पहले ऐसा नहीं था। हाल के दिनों में बांग्लादेशी मुस्लिमों की असामाजिक गतिविधियों में लिप्तता के चलते लोगों में एक डर भी बैठ गया है। कोलकाता में एक किराने की दुकान चलाने वाले रमेश कहते हैं कि बांग्लादेशी मुसलमानों की बढ़ती संख्या और उसके प्रभाव के कारण आज हम जैसे कई लोगों की रोजी-रोटी भी प्रभावित होने लगी है। उनकी तादाद इतनी हो गई है कि उन्हें काम ज्यादा सहूलियत से मिल जाता है।
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