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जीडीपी पर पश्चिम एशिया तनाव का असर: आपूर्ति संकट से बढ़ेगी महंगाई, अनिश्चित वैश्विक माहौल में ऊर्जा सुरक्षा

Sat, 28 Mar 2026 06:29 AM IST
Shubham Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। अगर संकट लंबा चला तो 2026-27 में आर्थिक वृद्धि में 1.3 प्रतिशत अंक की कमी और महंगाई में 3.2 फीसदी वृद्धि हो सकती है। तनाव से ऊर्जा शुल्क बढ़े हैं, आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है और व्यापार प्रभावित हुआ है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार
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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। अगर यह संकट लंबा चलता है तो 2026-27 के दौरान क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि में 1.3 फीसदी अंक तक गिरावट आ सकती है, जबकि महंगाई 3.2 फीसदी बढ़ सकती है। कहा जा रहा कि संघर्ष का असर मुख्य रूप से महंगे ऊर्जा शुल्क, आपूर्ति शृंखला में बाधा, व्यापार में रुकावट और वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने के रूप में सामने आ रहा है।

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रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, एशिया के देशों का पश्चिम से सीधा व्यापार भले कम हो, लेकिन वे ऊर्जा आयात और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर होने के कारण ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। रेटिंग एजेंसियों ने खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य का जिक्र किया है, जहां से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल और गैस की सप्लाई गुजरती है। इसका बड़ा हिस्सा एशिया तक पहुंचता है।

प्रभावित हुई शिपिंग, कैसे?
मौजूदा तनाव के कारण यहां शिपिंग प्रभावित हुई है, जिससे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया और कुछ समय के लिए यह 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसके अलावा, वित्तीय बाजारों में भी तनाव दिखा। शेयर बाजार गिरे हैं और बॉन्ड यील्ड बढ़ी है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कीमतों को पूरी तरह नियंत्रित करने के बजाय उन्हें आंशिक रूप से बढ़ने दिया जाए, ताकि ऊर्जा स्रोतों की बचत हो और वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा मिले। केंद्रीय बैंक महंगाई पर नजर रखें और बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकें।
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आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा विपरीत प्रभाव  
रेटिंग एजेंसी इक्रा का कहना है, अगर संघर्ष जल्दी खत्म हो जाता है तो इसका असर सीमित रह सकता है। अगर हालात लंबे समय ऐसे ही तक बने रहते हैं तो यह क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। एशियाई विकास बैंक ने सरकारों को सलाह दी है कि वे आर्थिक स्थिरता बनाए रखें, ऊर्जा की खपत को नियंत्रित करें और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम करें। साथ ही, सब्सिडी और कीमत नियंत्रण के बजाय जरूरतमंद वर्गों के लिए सीमित समय के समर्थन उपाय अपनाने पर जोर दिया गया है।

खाड़ी देशों से आने वाले धन में कमी
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि शिपिंग में रुकावट से लागत बढ़ेगी, उत्पादन में देरी होगी और आपूर्ति शृंखला पर दबाव बढ़ेगा। उसने कहा, खाड़ी देशों पर निर्भर राष्ट्रों  को झटका लग सकता है, क्योंकि वहां आर्थिक गतिविधियां कमजोर होने से प्रवासी कामगारों की आय घट सकती है। इससे रेमिटेंस (विदेश से आने वाला पैसा) कम हो सकता है। 
आगे दिख सकते हैं ये हालात

एडीबी का मानना है कि अगर संघर्ष जल्दी खत्म हो जाता है तो असर सीमित रहेगा। लंबा संघर्ष ग्रोथ और महंगाई असर डालेगा। दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशान्त देशों की ग्रोथ पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, जबकि भारत सहित दक्षिण एशियामें महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ सकती है। एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने कहा कि लंबा संकट देशों के लिए मुश्किल स्थिति पैदा कर सकता है, जहां उन्हें कम ग्रोथ और ज्यादा महंगाई के बीच संतुलन बनाना होगा।

बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा
वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते बढ़ती तेल और गैस की कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती हैं। ऊर्जा की ऊंची कीमतें वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर दबाव डाल सकती हैं। सरकार को उर्वरक और एलपीजी जैसी सब्सिडी पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। 
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