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पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी चिंता: होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता बनी चुनौती, अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

Thu, 04 Jun 2026 07:54 PM IST
अमन तिवारी आईएएनएस, नई दिल्ली

सार

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत की तेल, गैस और एलपीजी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है, जिससे किसी भी रुकावट का व्यापक असर पड़ सकता है।
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होर्मुज जलडमरूमध्य - फोटो : FreePik
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विस्तार
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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। भारत उन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन पर इस संकट का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि भारत अपनी तेल, गैस और खाद की जरूरतों के लिए फारस की खाड़ी के देशों पर बहुत अधिक निर्भर है।
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आंकड़ों के अनुसार, भारत का लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल, 68 प्रतिशत एलएनजी और 85 प्रतिशत से ज्यादा एलपीजी होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से आता है। सेंटर फॉर पीस स्टडीज (CPS) के एक लेख में बताया गया है कि इस रास्ते में कोई भी रुकावट भारत की आर्थिक रफ्तार को रोक सकती है। इससे खाद उत्पादन, बिजली और ईंधन की उपलब्धता पर बुरा असर पड़ने की आशंका है।

इस संकट के बीच भारत ने अपने हितों को बचाने के लिए कूटनीतिक रास्ता अपनाया है। विदेश मंत्री ए जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से कई बार सीधी बातचीत की। इस बातचीत का बड़ा फायदा मिला है। ईरान ने 'शिवालिक नंदा' और 'देवी' जैसे भारतीय टैंकरों को सुरक्षित रास्ता देने की अनुमति दी। इसके बाद 'पिरामल' और 'पुष्पक' जैसे कई अन्य जहाज भी वहां से सुरक्षित निकल सके। यह दिखाता है कि भारत सरकार बातचीत के जरिए संकट सुलझाने के लिए गंभीर है।
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ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने की छूट दी है, लेकिन यह केवल थोड़े समय का समाधान है। भारत के पास अपने आपातकालीन भंडार में लगभग 10 दिनों का कच्चा तेल है। अगर विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर के व्यावसायिक भंडारों को भी मिला लिया जाए, तो यह आपूर्ति 74 दिनों तक चल सकती है।

ईरान भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंचने का एक अहम रास्ता है। भारत ने वहां चाबहार बंदरगाह में काफी निवेश किया है। इसके अलावा, उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भी भारत के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह चीन की 'बेल्ट एंड रोड' योजना का मुकाबला करने में मदद करता है।

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आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ रही हैं। अगर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाती है, तो सामान बनाने और उसे भेजने की लागत बढ़ जाएगी। इससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आएगा। खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख से ज्यादा भारतीय कामगारों की कमाई पर भी असर पड़ सकता है। विमानन क्षेत्र में ईंधन की बढ़ती कीमत और हवाई मार्ग की पाबंदियां मुश्किलें बढ़ाएंगी।
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भारत का लक्ष्य 2025-26 में 7.4 से 7.6 प्रतिशत की विकास दर हासिल करना है। वह 2027 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना चाहता है। लेकिन यह संकट इन लक्ष्यों में बाधा डाल सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट जल्दी सुलझने की उम्मीद कम है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी और निरंतर कूटनीति की जरूरत है। संकट लंबा खिंचने पर अन्य देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं, जिससे चुनौतियां और बढ़ेंगी।
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