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सेहत: मोटापा जांच का पैमाना वजन-लंबाई का अनुपात न हो, विशेषज्ञों के समूह का निष्कर्ष- BMI एक जैसा नहीं रह सकता

Thu, 16 Jan 2025 05:59 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला ब्यूरो

सार

भारत सहित पूरी दुनिया के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने नया नजरिया रखा है। इसके तहत मोटापे की पहचान के लिए सिर्फ बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) जांच काफी नहीं है। यह एक सहायक निगरानी उपकरण हो सकता है लेकिन रोग पहचान के लिए यह एकमात्र तरीका नहीं होना चाहिए।
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मोटापा - फोटो : Freepik.com
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विस्तार
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मोटापे के इलाज में भारत सहित पूरी दुनिया के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने नया नजरिया रखा है। इसके तहत मोटापे की पहचान के लिए सिर्फ बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) जांच काफी नहीं है। यह एक सहायक निगरानी उपकरण हो सकता है लेकिन रोग पहचान के लिए यह एकमात्र तरीका नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, डॉक्टर किसी मरीज में अतिरिक्त वसा और शरीर में वितरित होने की प्रक्रिया का आकलन करके बीमारी की पुष्टि कर सकते हैं।
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उदाहरण के लिए शरीर में मोटापे का पता लगाने के लिए कमर की माप, कमर से कूल्हे का अनुपात कमर से ऊंचाई का अनुपात जैसे अन्य तरीकों का भी उपयोग करना चाहिए। मौजूदा समय में हो यह रहा है कि डॉक्टर मरीज में मोटापे की जांच के लिए बीएमआई के अनुमान पर भरोसा कर रहे हैं जबकि अब नया नजरिया कहता है कि उनका यह आकलन हमेशा सही तस्वीर पेश नहीं करता जिससे गलत जांच हो सकती है और उससे मरीजों को नुकसान पहुंच सकता है।

दरअसल बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई की गणना किसी व्यक्ति के कुल वजन और लंबाई का अनुपात निकालकर शरीर में फैट यानी मोटापा की मात्रा का अनुमान लगाया जाता है। साल 2009 में मोटापा की पहचान में इस गणना के इस्तेमाल का दृष्टिकोण सामने आया लेकिन करीब 15 साल के लंबे अनुभव और बीमारी के प्रति नई जानकारियां एकत्रित करने के बाद स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अब इसे नाकाफी बताया है।
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एक जैसा हमेशा नहीं रह सकता बीएमआई
नई दिल्ली स्थित फोर्टिस सी-डॉक हॉस्पिटल के निदेशक डॉ अनूप मिश्रा का कहना है कि 30 किग्रा/एम2 और उससे अधिक बीएमआई वाले व्यक्ति को मोटा माना जा सकता है लेकिन रोगियों में बीएमआई हमेशा 30 से ऊपर नहीं रह सकता। इसका मतलब यह है कि उनके स्वास्थ्य जोखिम पर किसी का ध्यान नहीं जा सकता जबकि भारत में मोटापे की दरें तेजी से बढ़ रही हैं और यह शहरों से बाहर भी पसरना शुरू हो गया है।  

कई बीमारियों का कारण है मोटापा
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के वरिष्ठ डॉ. नवल विक्रम ने बताया कि इस ऐतिहासिक विश्लेषण ने भारतीय आबादी के लिए मोटापे को फिर से परिभाषित किया है। यह नया वर्गीकरण भारतीयों में मोटापे की वजह से होने वाली बीमारियों के समाधान में अहम भूमिका निभाएगा।

मामले में डॉ. नवल बताते हैं कि भारतीयों में पेट के आसपास चर्बी का संबंध इन्फ्लेमेशन (सूजन) व अन्य संबंधित बीमारियों से है। इसमें मधुमेह, हड्डियों की कमजोरी, फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता), कार्डियोवास्कुलर रोगों या फिर रक्तचाप रोग भी शामिल हैं।
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