हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर मन्नान बशीर वानी के मारे जाने के बाद कुछ लोग यह आरोप लगाने लगे हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आतंकी बनने कश्मीर से छात्र आते हैं। इससे वैसे छात्र-छात्राएं बेहद दुखी एवं व्यथित हैं, जो गंभीरता से अध्ययन करने एएमयू में आए हैं। उन्हें लग रहा है कि एक साजिश के तहत उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है ताकि वह कैंपस छोड़कर भाग जाए।
कश्मीरी छात्र साजिद का कहना है कि हम लोग एएमयू में आतंकी बनने नहीं बल्कि अपने मां-बाप के अरमान पूरे करने आते हैं। उनका कहना है कि एएमयू में हमारा सफर किताब-कलम से शुरू हुआ है और इसी के माध्यम से परिवर्तन लाना चाहते हैं। बंदूक से परिवर्तन नहीं लाया जा सकता।
कश्मीर के छात्रों को संदेह की नजर से देखने वालों से आग्रह करते है कि हमारे हाथ से कलम नहीं छीने। हमें देशद्रोही नहीं कहा जाए। एएमयू छात्र संघ के उपाध्यक्ष सज्जाद सुभान रॉथर कहते हैं कि कश्मीरी होना क्राइम नहीं है।
कश्मीरी छात्रों को आतंकवादी कहना बंद किया जाए। कश्मीर के युवा बेहतर कैरियर के लिए आते हैं। उच्च शिक्षा हासिल कर प्रदेश के विकास में सहयोगी बनना चाहते हैं। वह अपने मां-बाप के सपने को चकनाचूर होने देना नहीं चाहते।
मन्नान वानी के मारे जाने के बाद उपजे माहौल से भय का ऐसा वातावरण सृजित हुआ है कि कश्मीर के छात्र खुलकर मीडिया से बात करने में कतरा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि एएमयू में करीब 950 छात्र-छात्रा पढ़ते हैं, जिसमें से 250 छात्राएं हैं। करीब 150 से अधिक छात्र विभिन्न विभागों में शोध कर रहे हैं।
वर्तमान सत्र में सर्वाधिक 144 छात्र एमएम हॉल में रहते हैं। दूसरे नंबर पर हबीब हॉल है, जिसमें करीब 100 छात्र है। एएमयू भूगर्भ विज्ञान विभाग के शोध छात्र से आतंकी बना मन्नान बशीर वानी इसी हॉल में रहता था। छात्राएं एएमयू के 4-5 अलग-अलग गर्ल्स हॉस्टल में रहती हैं।
छात्राएं भी मौन प्रदर्शन में हुईं शामिल
कैनेडी हॉल के सामने कश्मीरी छात्रों के प्रदर्शन में कुछ छात्राएं भी शामिल हुई। हालांकि अधिकतर कश्मीर की नहीं थी। एमए की छात्रा रौनक शाही ने कश्मीरी छात्रों की जमकर वकालत की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कश्मीर के छात्र नमाज ए जनाजा पढ़ते तो कौन सा गुनाह कर देते। हालांकि मौन प्रदर्शन के दौरान एक-दो बार छात्रों ने नारेबाजी भी की।