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WB Violence Ground Report: दहशत से उड़ी नींद, कानों में गूंजती है मारो-मारो की आवाज; आंखों में भय साफ नजर...

सार

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा में हिंसा के बाद दहशत का माहौल है। पीड़ितों का कहना है कि हिंसा के खौफनाक मंजर के चलते नींद तक नहीं आ रही। उन्होंने बताया कि कानों में मारो-मारो की आवाज गूंजती है। राहत शिविर मुर्शिदाबाद हिंसा की पीड़िताओं का दर्द समेटे है। यहां शरण लेने वाले लोगों की आंखों में भय साफ नजर आता है।
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पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के पीड़ितों ने बयां किया दर्द - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नौ दिन के बच्चे को गोद में लेकर दुलार करते-करते अचानक आंसू झरने लगते हैं...हिंसा वाली रात की दहशत आंखों में तैरने लगती है...आंसू पोंछकर बच्चे को निहारती है और अगले ही पल भविष्य की सोचकर दिल धक्क से बैठ जाता है...यह हैं बेदवना गांव की सप्तमी मंडल। वक्फ संशोधन कानून के विरोध में मुर्शिदाबाद में हिंसा का जो तांडव मचा, उसकी गवाह भी हैं और पीड़िता भी।

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सप्तमी अभी मालदा के पारलालपुर के हाईस्कूल में बने राहत शिविर में रह रही हैं। हिंसा के बाद किसी तरह गंगा पार करके इस शिविर में पहुंची हैं। मंगलवार को जब हमने हिंसा को लेकर सवाल पूछा, तो नम आंखों से कहती हैं...उस रात का दर्द सुनाने की न तो हिम्मत है और न ही कलेजा। भय इतना है कि रात में नींद तक नहीं आती।

कानों में गूंजता है-मारो-मारो...
भरोसा नहीं होता कि एकसाथ रहने वाले लोग अचानक हैवान कैसे बन सकते हैं...दुख-दर्द बांटने वाले हम पर जुल्म की कैसे सोच सकते हैं। हमारे कपड़ों को खींचने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं। इन्सान को जानवर बनते देर नहीं लगती...यह सुना था, लेकिन उस रात देख भी लिया। घर धूं-धूं कर जल रहे थे। हर कोई जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहा था। पति घर पर नहीं थे...चार दिन के बच्चे को लेकर मैंने किसी तरह नदी पार की...पता नहीं, कहां से इतनी हिम्मत आ गई। यह कहते-कहते सप्तमी सुबकने लगती हैं। खुद को संभालकर कहती हैं...बच्चा बीमार था, पर मैं दवा तक नहीं उठा पाई।

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राहत शिविर में रहने वाली सभी महिलाओं की पीड़ा और उनके साथ हुई हैवानियत की दास्तां कमोबेश एक जैसी ही है। शिविर में 150 से अधिक परिवार और करीब सात सौ लोग रह रहे हैं। उनकी सुरक्षा में शिविर के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है।

जिन्हें अपना समझते थे, वे हमें नोच रहे थे
धूलियान की एक पीड़िता ने कहा, हिंसा करने वाले हैवान हो गए थे। पेट्रोल डालकर घरों को आग लगा रहे थे। हम सब नष्ट होते देख रहे थे, पर कुछ कर नहीं पा रहे थे। जिन्हें हम अपना समझते थे, वे हमें नोचने की कोशिश कर रहे थे, हमारे कपड़े फाड़ रहे थे। हम अंदर तक हिल गए हैं...कैसे जाएंगे अपने घर, कल वे हमारे बच्चों के साथ ऐसा नहीं करेंगे, इसका क्या भरोसा है।

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पुलिस तमाशा देखती रही
वार्ड नंबर पांच की एक महिला ने कहा, हम पर जुल्म हो रहा था। हम बचाने की गुहार लगा रहे थे और पुलिस तमाशा देख रही थी। घर जल रहे थे, सामान को आग लगाई जा रही थी। हमें पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीएसएफ है, तो सुरक्षित रहने की उम्मीद बची है। जब तक बीएसएफ कैंप नहीं लगता, घर की व्यवस्था नहीं होती और रोजगार का कोई जरिया नहीं दिया जाता, हम वहां जाकर क्या करेंगे।
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...तो मैं सुरक्षित होती
एक पीड़िता ने दर्द बयां करते हुए कहा, मेरा घर जला दिया गया। मैं दो बच्चियों के साथ किसी तरह से भाग कर यहां पहुंची। आज ऐसा लग रहा है कि अगर मुस्लिम परिवार में पैदा होती, तो मैं भी सुरक्षित होती। जो कपड़े पहने थे, उसी में भागना पड़ा। 

गुस्साए लोगों ने सांसद को उतरने नहीं दिया
मालदा दक्षिण के सांसद ईशा खान चौधरी राहत शिविर में पहुंचे, लेकिन गुस्साए लोगों ने उन्हें गाड़ी से उतरने नहीं दिया। बाद में उन्होंने कहा, मैं कोशिश करूंगा कि जल्द से जल्द हालात सुधरें।

सांसद खगेन बोले-हिंदुओं पर अत्याचार सियासी साजिश
वहीं राहत शिविर में पहुंचे उत्तर मालदा के सांसद खगेन मुर्मू ने कहा कि हिंदुओं पर यह अत्याचार सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है। बंगाल का माहौल खराब किया जा रहा है।
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