कानों में गूंजता है-मारो-मारो...
भरोसा नहीं होता कि एकसाथ रहने वाले लोग अचानक हैवान कैसे बन सकते हैं...दुख-दर्द बांटने वाले हम पर जुल्म की कैसे सोच सकते हैं। हमारे कपड़ों को खींचने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं। इन्सान को जानवर बनते देर नहीं लगती...यह सुना था, लेकिन उस रात देख भी लिया। घर धूं-धूं कर जल रहे थे। हर कोई जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहा था। पति घर पर नहीं थे...चार दिन के बच्चे को लेकर मैंने किसी तरह नदी पार की...पता नहीं, कहां से इतनी हिम्मत आ गई। यह कहते-कहते सप्तमी सुबकने लगती हैं। खुद को संभालकर कहती हैं...बच्चा बीमार था, पर मैं दवा तक नहीं उठा पाई।
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राहत शिविर में रहने वाली सभी महिलाओं की पीड़ा और उनके साथ हुई हैवानियत की दास्तां कमोबेश एक जैसी ही है। शिविर में 150 से अधिक परिवार और करीब सात सौ लोग रह रहे हैं। उनकी सुरक्षा में शिविर के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है।
जिन्हें अपना समझते थे, वे हमें नोच रहे थे
धूलियान की एक पीड़िता ने कहा, हिंसा करने वाले हैवान हो गए थे। पेट्रोल डालकर घरों को आग लगा रहे थे। हम सब नष्ट होते देख रहे थे, पर कुछ कर नहीं पा रहे थे। जिन्हें हम अपना समझते थे, वे हमें नोचने की कोशिश कर रहे थे, हमारे कपड़े फाड़ रहे थे। हम अंदर तक हिल गए हैं...कैसे जाएंगे अपने घर, कल वे हमारे बच्चों के साथ ऐसा नहीं करेंगे, इसका क्या भरोसा है।
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पुलिस तमाशा देखती रही
वार्ड नंबर पांच की एक महिला ने कहा, हम पर जुल्म हो रहा था। हम बचाने की गुहार लगा रहे थे और पुलिस तमाशा देख रही थी। घर जल रहे थे, सामान को आग लगाई जा रही थी। हमें पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीएसएफ है, तो सुरक्षित रहने की उम्मीद बची है। जब तक बीएसएफ कैंप नहीं लगता, घर की व्यवस्था नहीं होती और रोजगार का कोई जरिया नहीं दिया जाता, हम वहां जाकर क्या करेंगे।