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Supreme Court: 'वक्फ एक इस्लामी सिद्धांत लेकिन इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं', सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा

Wed, 21 May 2025 04:29 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

Supreme Court: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वक्फ इस्लामी अवधारणा है, लेकिन यह इस्लाम का आवश्यक हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ संपत्ति का अधिकार विधायी नीति के तहत दिया गया है, जिसे वापस लिया जा सकता है।  
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि किसी को भी सरकारी भूमि पर स्वामित्व का दावा करने का अधिकार नहीं है। सरकार को उपयोगकर्ता की ओर से वक्फ घोषित की गई अपनी संपत्ति वापस लेने का कानूनी अधिकार है। केंद्र ने यह भी कहा, वक्फ एक इस्लामी अवधारणा है लेकिन यह इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है। वक्फ इस्लाम में दान के अलावा और कुछ नहीं है। हर धर्म में दान को महत्व दिया गया है लेकिन यह किसी भी धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

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देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ के सामने वक्फ संशोधन कानून 2025 की सांविधानिकता पर चल रही सुनवाई के दौरान बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के ही एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, इस फैसले में केंद्र सरकार को वक्फ घोषित अपनी संपत्ति को वापस हासिल करने की अनुमति दी गई है।

मेहता ने याचिकाओं पर सवाल उठाते हुए कहा, संशोधित कानून से प्रभावित हुए किसी भी पक्ष ने अदालत का रुख नहीं किया है और किसी ने यह भी नहीं कहा है कि संसद के पास इस कानून को पारित करने का अधिकार नहीं है। वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ यह झूठी कहानी फैलाई जा रही है कि वक्फ के दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे नहीं तो वक्फ पर कब्जा कर लिया जाएगा। असलियत यह है कि सरकार 140 करोड़ नागरिकों की ओर से संपत्ति की संरक्षक है। सरकार की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक संपत्ति का अवैध रूप से उपयोग न किया जाए।
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'वक्फ बाय यूजर मौलिक अधिकार नहीं, कभी भी वापस लिया जा सकता है'
मेहता ने कहा, वक्फ बाय यूजर मौलिक अधिकार नहीं है। इसे कानून के जरिए मान्यता दी गई है। जो अधिकार कानून के जरिए दिया गया हो उसे कभी भी वापस लिया जा सकता है। हमने 1923 से चली आ रही बुराई को खत्म की। हर हितधारक की बात सुनी गई। मेरा कहना है कि कुछ याचिकाकर्ता पूरे मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने का दावा नहीं कर सकते।

कोर्ट रूम लाइव 
मेहता: याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील गलत है कि नए कानून के तहत जिलाधिकारी स्तर से एक रैंक ऊपर का अधिकारी यह तय कर सकता है कि कोई वक्फ संपत्ति सरकारी है या नहीं। यह न सिर्फ भ्रामक बल्कि गलत तर्क है।

सीजेआई: लेकिन याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस मामले में सरकार अपना दावा खुद तय करेगी।
मेहता: राजस्व अधिकारी यह तय करते हैं कि कोई जमीन सरकारी है या नहीं। लेकिन यह सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड के लिए होता है। वे अधिकारी भूमि का मालिकाना हक तय नहीं कर सकते। उनका फैसला अंतिम नहीं होता। अगर किसी ने खुद को वक्फ बाय यूजर के तौर पर रजिस्टर किया है तो यहां दो अपवाद होंगे। ऐसी संपत्ति पर विवाद का मतलब होगा कि किसी निजी पक्ष ने मुकदमा दायर किया हो कि यह मेरी संपत्ति है जिसे वक्फ घोषित किया गया है। यह विवाद सक्षम अदालत के फैसले से निपटाया जाएगा। दूसरा अपवाद सरकारी संपत्ति का है। इस बारे में शुरुआती बिल में कहा गया था कि कलेक्टर फैसला लेंगे। आपत्ति यह थी कि कलेक्टर अपने मामले में खुद जज होंगे। इसलिए जेपीसी ने सुझाव दिया कि कलेक्टर के अलावा किसी और को नामित अधिकारी बनाया जाए।

सीजेआई: इसका मतलब है कि कलेक्टर सिर्फ पेपर इंट्री होंगे?
मेहता: हां, हमने हलफनामे में भी कहा है कि अगर कोई सरकारी जमीन है तो सरकार इसके बारे में मुकदमा दाखिल करेगी। 3सी प्रावधान के तहत न्याय तक पहुंच से इन्कार नहीं किया गया है। प्रभावित पक्ष विवाद के किसी भी स्तर पर वक्फ ट्रिब्यूनल से संपर्क कर सकता है जो अंतिम स्वामित्व तय करेगा, अथवा हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील होगी। राजस्व रिकॉर्ड को अपडेट करना केवल यह सुनिश्चित करता है कि अधिकारों के रिकॉर्ड को सही तरीके से बनाए रखा गया है

सीजेआई: जो तस्वीर पेश की गई है उसके तहत एक बार कलेक्टर ने कार्यवाही शुरू कर दी, तो संपत्ति वक्फ नहीं रह जाएगी और जांच पूरी हो जाने के बाद, संपत्ति को कब्जे में ले लिया जाएगा।
मेहता: वैधानिक प्रावधान हैं कि अगर मालिकाना हक निर्धारित नहीं होता, तो हमें मुकदमा करना होगा

'किसी भी धार्मिक गतिविधि में शामिल नहीं होता वक्फ बोर्ड'
मेहता ने कहा, वक्फ बोर्ड का काम पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष है। यह किसी भी धार्मिक गतिविधि में शामिल नहीं होता। इसके उलट हिंदू ट्रस्ट मंदिर की हिंदू धार्मिक गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल होते हैं और यही अन्य धर्मों से यहां मुख्य अंतर है। ऐसा इसलिए क्योंकि वक्फ का मतलब केवल संपत्ति का समर्पण है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अधिनियम का विरोध करते हुए इसे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन बताया था।

वक्फ बाय यूजर क्या है
उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ या कहें वक्फ बाय यूजर का अर्थ ऐसी संपत्ति से है जो लंबे समय से धार्मिक या धर्मार्थ इस्तेमाल हो रही हो, तो उसे बिना किसी कागजात के भी वक्फ घोषित किया जा सकता है।

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अप्रैल संसद से पारित किया गया था वक्फ संशोधन विधेयक
सीजेआई बी.आर.गवाई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 को अप्रैल में संसद से पारित किया गया था और पांच अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूरी दे दी थी। जिसे बाद यह कानून बन गया। लोकसभा में इसके पक्ष में 288 और विपक्ष में 232 मत पड़े थे, जबकि राज्यसभा ने समर्थन में 128 और विरोध में 95 मत पड़े थे।  

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