विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने वक्फ बोर्ड पर गठित जेपीसी को सुझाव दिए हैं। जिसमें कि सभी धर्मों की संपत्तियों को सुरक्षित-संरक्षित रखने के लिए एक समान कानून बनाया जाए जिससे किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। विहिप ने कहा है कि यदि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है तो इसमें अलग-अलग धर्मों या उनकी संपत्तियों के लिए अलग-अलग कानून नहीं होने चाहिए। देश का कानून जिस तरह देश के किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव नहीं करता, उसी तरह धार्मिक संपत्तियों के संरक्षण, उनसे संबंधित विवाद के निबटारे की व्यवस्था एक मंच पर एक समान तरीके से किया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 44 में यह प्रावधान है कि स्टेट पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यहां पर धार्मिक मामले में यही बात सभी धर्मों के लिए लागू होती है।
वक्फ बोर्ड बनने के समय की बहस का लिया सहारा
विहिप की ओर से कहा गया है कि वक्फ बनने के समय सांसदों की चर्चा का सहारा लिया है। विहिप ने कहा है कि वक्फ अधिनियम, 1954 को सरकार ने संसद में पेश नहीं किया था। मोहम्मद अहमद काजमी ने इसे प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में पेश किया था। विधेयक को राज्य सभा की प्रवर समिति को भेज दिया गया। तत्कालीन कानून और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सीसी बिस्वास प्रवर समिति के अध्यक्ष बनाए गए।
लेकिन वक्फ के गठन के समय हुई चर्चा के दौरान राज गोपाल नायडू ने कहा था कि 'राज्य के नीति के निर्देशक सिद्धांत कहते हैं कि एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। ऐसे में क्या यह बेहतर और उचित नहीं है कि हमारे पास पूरे भारत में सभी धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्तों के लिए समान नागरिक संहिता हो, जो न केवल मुसलमानों को बल्कि हिंदुओं, पारसियों, जैनियों, सिखों और भारत में पाए जाने वाले हर समुदाय पर लागू हो। मुसलमानों के धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्तों के लिए अलग कानून क्यों होना चाहिए?
विहिप अध्यक्ष आलोक कुमार के माध्यम से भेजे गए पत्र में सुझाव दिया गया है कि विभिन्न धार्मिक समुदायों की संपत्तियों के नियंत्रण और प्रबंधन के लिए अलग-अलग कानूनों की बजाय देश में सभी धार्मिक संपत्तियों की बंदोबस्ती के लिए एक ही कानून होना चाहिए।