वीर चक्र से सम्मानित शहीद की विधवा को 46 साल के बाद न्याय मिला है। आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने उसे वीर चक्र से सम्मानित की विधवा को मिलने वाली सभी वित्तीय सुविधाएं बहाल करने और बकाए का भुगतान करने का आदेश दिया है।
रक्षा मंत्रालय की खिंचाई करते हुए उस नीति को भी खारिज कर दिया है जिसके अनुसार शहीद की विधवा अगर उसके भाई के साथ शादी नहीं करती है तो उसकी सारी सुविधाएं रोक दी जाएंगी। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
जस्टिस वीके शाली और लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिंह की पीठ ने कहा कि एक तरफ तो राष्ट्रपति शहीद की विधवा को उसकी पति की वीरता के लिए उसे पुरस्कार देते हैं और दूसरी तरफ उसको मिलने वाली वित्तीय सुविधाएं रोककर उसका अपमान किया जाता है।
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यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है जिसके तहत हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है। इसके मद्देनजर सरकार की वह नीति खारिज की जाती है जिसमें वीरता पुरस्कार विजेता की विधवा को शादी की वजह से वित्तीय सुविधाओं को महरूम कर दिया जाता है।