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महज त्रिपुरा तक सिमटकर रह गए वामदलों को केरल ने दिया सहारा

Fri, 20 May 2016 04:25 AM IST
हेमंत रस्तोगी/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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केरला पर वामपंथियों का कब्जा - फोटो : PTI
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लोकसभा चुनाव के बाद धरातल में चले गए वाम दलों को केरल ने संजीवनी प्रदान कर दी है। महज त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य तक सिमटकर रह गए वाम दलों को केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को सहारा मिला है। हालांकि सच्चाई यह भी है कि केरल में मिली जीत को बंगाल की करारी हार ने बेमजा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
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बंगाल की हार पार्टी की सेंट्रल कमेटी की बैठक में महासचिव सीताराम येचुरी के लिए असहज स्थितियां खड़ी करने जा रही है। यह येचुरी ही थे जिनकी इच्छा पर बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया गया। फायदा तो कोई नहीं मिला उलट हालत यह हो गई कि गठबंधन साथी कांग्रेस ने ही सीटों के नंबर में वामदलों को पछाड़ राज्य में उसे मुख्य विपक्षी दल भी नहीं रहने दिया। बंगाल की हार यह भी बताने के लिए काफी है कि निकट भविष्य में अब कांग्रेस के साथ गंठबंधन की संभावनाएं कम ही हैं।

वाम दलों का एक धड़ा और केरल विंग किसी भी कीमत पर बंगाल के साथ गठबंधन नहीं चाहते थे। इसका विरोध भी हुआ, लेकिन नए महासचिव येचुरी और बंगाल का धड़ा ममता बनर्जी को पटखनी देने के लिए इस प्रयोग से गुरेज नहीं कर रहा था। येचुरी को उम्मीद थी कि कांग्रेस के साथ मिलकर ममता  के किले में सेंध लगाई जा सकती है, लेकिन परिणाम ने जहां येचुरी की स्थिति को कमजोर कर दिया है वहीं वाम दलों को इस बात का भी अहसास करा दिया है कि उनके प्रति बंगाल में लोगों का गुस्सा अब तक कम नहीं हुआ है।
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'गठबंधन किया जाना गलत कदम'

पश्चिम बंगाल में निराशा - फोटो : PTI
बंगाल की हार और केरल की जीत सीपीआई एम के पूर्व महासचिव प्रकाश करात के छोटे पड़ चुके कद को फिर से पुर्नजीवित करने का काम कर सकती है। वहीं उनकी पत्नी वृंदा करात ने बंगाल के परिणाम के बाद मांग भी उठा दी है कि इस हार की समीक्षा की जानी चाहिए। यही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया जाना गलत कदम था। 

दल की अगली सेंट्रल कमेटी की बैठक में केरल की जीत से ज्यादा बंगाल की हार का मुद्दा गरमाने वाला है, जिसमें कांग्रेस से गठबंधन को लेकर येचुरी कठघरे में हो सकते हैं।
केरल में वामदल वहां के मुख्यमंत्री ओमन चांडी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और सत्ताविरोधी लहर के चलते वापसी की उम्मीद लगाए बैठे थे। पिछले तीन दशकों से राज्य में सत्ताविरोधी लहर का इतिहास रहा है।

हालांकि तमिलनाडु में भी यही स्थिति रही है। वहां जयललिता ने वापसी कर इस मिथक को इस बार तोड़ दिया, लेकिन केरल में इतिहास नहीं बदला जा सका। एलडीएफ की बड़ी जीत सत्ताविरोधी लहर का बड़ा हिस्सा मानी जा रही है। बावजूद इसके वाम दलों के लिए बड़ी राहत यह है कि उनका राज त्रिपुरा के साथ अब केरल में भी हो गया है।
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