जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि वहां प्रदर्शन करने वाला छोटा समूह भारत की पूरी युवा पीढ़ी यानी जेन जी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। विहिप के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन ने प्रदर्शनकारियों के व्यवहार का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ कथित अभद्र भाषा, सुरक्षाकर्मियों से मारपीट और अश्लील हरकतों को भारत के युवाओं की पहचान नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि देश की युवा पीढ़ी धर्म, संस्कृति और राष्ट्र सेवा से भी जुड़ी हुई है।
जंतर-मंतर के प्रदर्शन को लेकर विहिप ने क्या कहा?
सुरेंद्र जैन ने कहा कि हाल के प्रदर्शनों को भारत की जेन जी की पहचान के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जेन जी एक बड़ा आयु वर्ग है और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले लोग इस पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्होंने कहा कि अलग विचार रखने वाले लोगों से बातचीत होनी चाहिए, लेकिन किसी छोटे समूह को पूरे देश के युवाओं की तस्वीर पेश करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जैन ने कहा कि उन्होंने कॉलेजों में पढ़ाया है और युवाओं के बीच समय बिताया है, लेकिन प्रदर्शन के दौरान जैसा व्यवहार देखने को मिला, वैसा उन्होंने पहले नहीं देखा।
जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन किस मुद्दे को लेकर था?
छात्रों के नेतृत्व में यह आंदोलन 20 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुआ था और कई शहरों तक फैल गया था। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी। 20 जुलाई को संसद की ओर 'चलो संसद' मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच टकराव हुआ था। भीड़ को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सुरक्षाबलों ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले इस्तेमाल किए थे। यह आंदोलन 25 जुलाई को उस समय खत्म हुआ, जब धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और सरकार ने प्रदर्शनकारी समूह की दूसरी मांगों को भी स्वीकार कर लिया।
विहिप ने युवाओं और जेन जी को लेकर क्या तर्क दिया?
जैन ने कहा कि भारत में जेन जी का दायरा जंतर-मंतर पर मौजूद युवाओं से कहीं बड़ा है। उन्होंने कहा कि सेना में शामिल होने वाले युवा भी इसी आयु वर्ग में आते हैं। उनके अनुसार, 20 से 25 साल की उम्र में बड़ी संख्या में युवा हर साल सशस्त्र बलों में शामिल होते हैं और उनकी संख्या जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों से कहीं ज्यादा है। उन्होंने युवाओं की धार्मिक और सांस्कृतिक भागीदारी का भी उदाहरण दिया। जैन ने दावा किया कि 25 साल से कम उम्र के 25 करोड़ से अधिक युवा कुंभ में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि मथुरा, वृंदावन, काशी, अयोध्या और वैष्णो देवी जैसे धार्मिक स्थलों पर भी बड़ी संख्या में युवा जाते हैं।
विहिप ने समान नागरिक संहिता पर क्या रुख रखा?
सुरेंद्र जैन ने समान नागरिक संहिता को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें 2029 से पहले भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन शासित राज्यों में इसे लागू करने की बात कही गई है। जैन ने इसे संविधान में दिया गया दायित्व बताया। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित करने में मदद करेगी और युवा पीढ़ी को देश के विकास से जोड़ने में भूमिका निभाएगी। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से दलगत हितों से ऊपर उठकर अपने-अपने राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की अपील की।
विदेशी फंडिंग को लेकर विहिप ने क्या मांग की?
विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए में प्रस्तावित बदलावों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक को लेकर भी जैन ने सख्त प्रावधानों की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि विदेश से आने वाले धन का इस्तेमाल धार्मिक मतांतरण और देश विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दलों को दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित में कड़े कानून बनाने का समर्थन करना चाहिए। जैन ने कहा कि विदेश से आने वाले धन का इस्तेमाल देश के हितों को नुकसान पहुंचाने, आतंकी गतिविधियों या धार्मिक मतांतरण को बढ़ावा देने के लिए नहीं होना चाहिए।
विदेशी फंडिंग के नियमों से बचने का क्या आरोप लगाया गया?
जैन ने दावा किया कि कुछ समूहों ने एफसीआरए के नियमों से बचने का नया तरीका अपनाया है। उनके मुताबिक, कुछ लोग विदेश जाकर डेबिट कार्ड लेकर भारत लौटे और ऐसे एक हजार से अधिक कार्ड के जरिए कुछ महीनों में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी की गई। जैन ने कहा कि इन लोगों को लगा कि इस तरीके से एफसीआरए के नियमों से बचा जा सकता है, लेकिन केंद्रीय जांच ब्यूरो ने इस मामले में केस दर्ज किया है। उन्होंने कहा कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और एफसीआरए कानून को और कड़ा किया जाना चाहिए।
क्या विहिप युवाओं से संवाद के खिलाफ है?
जैन ने स्पष्ट किया कि विहिप अलग विचार रखने वाले लोगों से बातचीत के पक्ष में है। उनका कहना है कि किसी विचार या समूह से असहमति होने के बावजूद संवाद का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए। लेकिन उनके मुताबिक, जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शनों में शामिल एक सीमित समूह के व्यवहार को पूरे भारत की युवा पीढ़ी से जोड़ना सही नहीं होगा। उन्होंने युवाओं की एक अलग तस्वीर पेश करते हुए धर्म, भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और राष्ट्र सेवा से जुड़े उदाहरण दिए। साथ ही एफसीआरए के मामले में भी उन्होंने राजनीतिक दलों से पार्टी हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित में कड़े प्रावधानों का समर्थन करने की अपील की।