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वाहन खरीदते वक्त अब और ढीली होगी आपकी जेब

Sat, 03 Dec 2016 07:51 AM IST
राजीव सिन्हा/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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आने वाले दिनों में वाहन खरीदते वक्त आपकी जेब और ढीली हो सकती है। संभव है कि वाहन खरीदते वक्त आपको अब सिर्फ एक वर्ष का नहीं बल्कि तीन वर्ष का बीमा एक साथ लेना पड़ेगा। साथ ही गाड़ी के पंजीकरण के वक्त आपको अतिरिक्त राशि देनी पड़ सकती है। हिट एंड रन मामले में पीड़ितों को मुआवजा देने के मद्देनजर सड़क सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त अमाइकस क्यूरी(न्यायालय मित्र) ने यह सुझाव दिया है। 
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अमाइकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति आदर्श गोयल की पीठ के समक्ष कहा कि हिट एंड रन मामले में बडी संख्या में लोग मारे जाते हैं। लेकिन अधिकतर को मुआवजा नहीं मिल पाता। उन्होंने बताया कि देशभर में करीब आठ करोड़ वाहनों का बीमा है। देशभर में करीब 39 फीसदी वाहन ऐसे हैं जिनका बीमा नहीं है। इस वजह से अधिकतर दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा नहीं मिल पाता।
 
अमाइकस क्यूरी ने सुझाव दिया है इसके लिए एक फंड तैयार किया जाना चाहिए। चूंकि बड़ी संख्या में लोग वाहनों का बीमा कराने में दिलचस्पी नहीं दिखाते लिहाजा वाहन खरीदने के वक्त लोगों से तीन वर्ष का बीमा एक साथ करवाया जाए। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया है कि नए वाहनों के पंजीकरण के वक्त लोगों से अतिरिक्त शुल्क वसूला जाना चाहिए। 
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उन्होंने बताया कि मोटरसाइकिल की खरीद पर 500 और कार की खरीद पर 1000 रुपये अतिरिक्त वसूला जाना चाहिए। वाहनों के साइज के हिसाब से राशि तय की जानी चाहिए। 
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देश में हर तीन मिनट में सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत होती है

साथ ही यह सुझाव भी दिया गया है कि हिट एंड रन मामले में मौत होने पर पीड़ित परिवार को तत्काल दो लाख रुपये मुआवजा मिलना चाहिए जबकि गंभीर रूप से घायल होने वालों को एक लाख रुपये तत्काल मुआवजा मिलना चाहिए। फिलहाल मौत होने पर 25 हजार और घायल होने पर 12500 रुपये देने का प्रावधान है। शीर्ष अदालत जनवरी में अमाइकस क्यूरी सहित अन्य स्टैकहोल्डर के पक्षों पर विचार करने के बाद अंतिम निर्देश पारित करेगी।

मालूम हो कि देश में हर तीन मिनट में सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत होती है। यानी  एक वर्ष में एक लाख 46 हजार लोगों की मौत होती है। पिछली सुनवाई में सड़क सुरक्षा को लेकर अदालती निर्देशों के बावजूद सरकारों द्वारा अब तक ठोस कदम नहीं उठाने पर पीठ ने सख्त आपत्ति जताई थी।
 
पीठ ने खासकर इस बात पर चिंता जताई कि सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए आधे लोगों के परिजनों को यह तक पता नहीं होता कि वे मुआवजे के भी हकदार है। ये गरीब या अशिक्षित होते हैं और कई तो ऐसे होते हैं जिनकी आमदनी से ही आजीविका चलती है। लेकिन जानकारी के अभाव में उन्हें उनका हक(मुआवजा) भी नहीं मिलता। 

पीठ ने सरकार से कहा था कि ऐसे लोगों के लिए कुछ न कुछ जरूर किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा था कि ऐसा कोई तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जिससे कि उन्हें यह पता हो कि ऐसी स्थिति में उन्हें किससे संपर्क करना है और कहां से मुआवजा लेना है। 
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