कोई भी वाहन उस वक्त बेहतर माइलेज देता है जब इंजन की रिवोल्यूशन प्रति मिनट (आरपीएम) और गेयर बॉक्स की आरपीएम बराबर होती है। अमूमन यह स्थिति उस वक्त होती है, जब गाड़ी पांचवें गीयर में चलती है। जाम में वाहन पहले या दूसरे गीयर में चलता है और लगातार क्लच दबता है तो माइलेज भी करीब आधी रह जाती है।
डीटीसी की लो-फ्लोर बसें बनती हैं जाम की बड़ी वजह
पीकऑवर में यदि डीटीसी की लो फ्लोर बस खराब होती है तो वाहन चालकों को दो-तीन घंटे तक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। रूट डायवर्ट के चलते उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जाम में खड़े रहते हैं या फिर वाहन रेंगते हुए चलते हैं। डीटीसी की सामान्य बसों को तो किसी तरह सड़क से हटा दिया जाता है, लेकिन लो-फ्लोर बस को हटाने के लिए ट्रैफिक पुलिस को खूब पसीना बहाना पड़ता है। इन बसों को हटाने के लिए ट्रैफिक पुलिस की रिक्वरी वैन भी काम नहीं आती। डीटीसी की विशेष रिक्वरी वैन ही इन बसों को सड़क से हटाती है। कई बार रिक्वरी वैन या मेकेनिक को मौके पर पहुंचने में कम से कम एक-दो घंटे लग जाते हैं।
पहले यह नियम था कि जिस डिपो की बस खराब हुई है, उसे ठीक करने के लिए वहीं से मेकेनिक आएगा। ऐसे में तीन-चार घंटे लगना लाजमी था, अब जगह-जगह पर कुछ वैन खड़ी की गई हैं। वहां से मेकेनिक आ जाता है। सूत्रों का कहना है कि ऐसी वैन की संख्या बहुत कम है। अधिकांश मामलों में मेकेनिक संबंधित बस डिपो से ही आता है। वैन पर अगर कोई मेकेनिक छुट्टी चला गया तो दूसरे इलाके से मेकेनिक बुलाना पड़ता है। इसमें कई घंटे लगते हैं।
ट्रक-ट्राला पलटता है तो सात-आठ घंटे तक ट्रैफिक प्रभावित
अगर कोई सामान से भरा ट्रक-ट्राला पलटता है या खराब होता है तो सात-आठ घंटे तक ट्रैफिक बाधित रहता है। ट्रैफिक पुलिस के पास खुद की क्रेन हैं, लेकिन वाहन मल्टी-एक्सल है तो उसे उठाने के लिए मेट्रो या राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से भारी क्रेन मांगी जाती है। यदि ट्राले में लदा सामान रोड पर बिखर गया है तो उसे हटाने के लिए मजदूर लाए जाते हैं। घटना रात में या अल सुबह हुई तो पीकऑवर में जाम लगना तय है। वजह, उस वक्त मजदूर नहीं मिलते।
अधिकांश कमर्शियल वाहनों की फिटनेस जांच सही तरीके से नहीं होती। आधे वाहन तो इतने पुराने हो जाते हैं कि वे सड़क पर चलने के क़ाबिल ही नहीं होते। इसके बावजूद उन वाहनों में तय क्षमता से कई गुना ज्यादा सामान भर दिया जाता है। ट्रैफिक पुलिस के पास न तो ओवरलोड वाहनों के खिलाफ कार्रवाई करने की पावर है और न ही उनका फिटनेस सर्टिफिकेट जांचने की। यह जिम्मेदारी परिवहन विभाग की है। रात के समय जो वाहन पलटते हैं, उनमें तय क्षमता से कहीं ज्यादा लोड रहता है। दिल्ली के सभी प्रवेश मार्गों पर ऐसे वाहनों की जांच की जानी अनिवार्य है, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। वजह, परिवहन विभाग के पास स्टाफ की कमी होना है। ट्रैफिक पुलिस अपने स्तर पर केवल स्थिति में फिटनेस सर्टिफिकेट की जांच करती है, जब कोई वाहन किसी दूसरे उल्लंघन में पकड़ा जाता है।
ये वजह भी हैं, जो किसी को दिखाई नहीं पड़ती
-रात के समय जूनियर चालक के हाथ में स्टेयरिंग थमाना
-कंटेनर और ऑयल टैंकर का लोड स्विफ्ट (असंतुलन की दशा में) होना
-तेज मोड या अचानक ब्रेक लेने से लोड आगे की तरफ सरकता है, नतीजा वाहन पलट जाता है
-माल की पैकिंग सही नहीं है तो ब्रेक और टर्निंग प्वाइंट पर सामान तेजी से आगे सरकता है, इससे हादसा होता है
-वाहन की फिटनेस न होना और ओवरलोडिंग भी ब्रेकडाउन की एक वजह