बनारस में हुए फ्लाईओवर हादसे के बाद सरकार एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। 18 लोगों की जान जाने एवं 50 के करीब लोगों के हताहत होने के बाद अब सवाल यही उठ रहा है कि फ्लाईओवर के निर्माण कार्य में इतनी जल्दी क्या थी, जो इतने भीषण हादसे में लापरवाही कारण बनी। यह बात तो सच है कि यह फ्लाईओवर इससे पहले भी कई बार अपने डिजाइन को लेकर विवादों में रह चुका है। एक विवाद इसकी समय सीमा को लेकर भी उठा था, जब इसकी मियाद दिसंबर 2017 से घटाकर मार्च 2017 कर दी गई थी, हालांकि बाद में इसे फिर बढ़ा दिया गया था।
समय से पहले कार्य पूरा करने के दिशा-निर्देशों के जवाब में मानकों को दरकिनार करते हुए मनचाहा मैटेरियल मिलाया गया और अपनी जेबें भरी गईं। सरकार ने लाखों का मुआवजा देकर पीड़ितों के घरवालों के जख्मों पर मरहम लगाया। सरकार को ध्यान देना होगा कि चुनाव से पहले विकास कार्यों के निर्माण संबंधी कार्य पूरे किए जाएं, पर इतनी जल्दबाजी में नहीं कि अगले चुनाव में वोट देने वाली जनता पर ही आफत बन पड़े।
फ्लाईओवर निर्माण कार्य में लापरवाही का आलम ये है कि पूरी रोड को उस तरीके से नहीं ढका गया, जैसे दिल्ली में मेट्रो लाइन के निर्माण के समय रोड घेरी जाती है। यह सीधे सीधे इस बात का इशारा है कि लापरवाही और भ्रष्टाचार जैसी बीमारियां, जो दशकों से देश की निर्माण परियोजनाओं को कमजोर करती आ रही हैं, इसको रोकने या गुनाहगारों की सजा के लिए आज तक बहुत कुछ नहीं किया जा सका है।
हर परियोजना को पूरा करने के लिए एक निश्चित समयावधि होनी चाहिए और अगर इस समयावधि में निर्माण पूरा न हो पाए, तो फिर ठेकेदारों/निर्माण एजेंसियों पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए। ऐसे हादसे अगर देश में अक्सर देखने को मिलते रहे, तो स्मार्ट सिटी जैसी बड़ी परियोजनाओं की बात करना बेमानी बात होगी और ऐसा न हुआ तो आप मानिए, बनारस जैसी घटनाएं बार-बार होंगी।