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Samwad 2025: गर्दनें कट गईं, धड़ चलते रहे..., टाइगर हिल की पूरी दास्तां परमवीर चक्र से सम्मानित योगेंद्र सिंह

Tue, 10 Jun 2025 04:17 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में अमर उजाला संवाद उत्तराखंड कार्यक्रम परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव ने भी शिरकत की। इस दौरान उन्होंने देशवासियों को एक बार फिर टाइगर हिल फतेह करने की दास्तां सुनाई।
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परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में अमर उजाला संवाद के मंच पर तमाम हस्तियों ने शिरकत की है। इसमें परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव ने भी शिरकत की है। सिर्फ 19 साल की आयु में परमवीर चक्र प्राप्त करने वाली ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव सबसे कम उम्र के सैनिक हैं। अमर उजाला संवाद में उन्होंने करगिल की जंग और टाइगर हिल पर लड़ाई के दौरान अपने अनुभव और सेना की शौर्य गाथा बताई है।
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सवाल- करगिल की जंग में टाइगर हिल पर हुआ क्या?
जवाब- आप सभी ने करगिल सुना है, लेकिन असल में वह करगिल धाम है। वहां मां भारती के 527 बेटों ने अपने लहू से मां भारती की जीत का स्वर्णिम इतिहास रचा। हमने पहले तोरोलिम में 22 दिन जंग लड़ी। 12 जून 1999 को उस पहाड़ी पर कई जवानों के बलिदानों के बाद विजय पताका लहराई। इसके बाद वरिष्ठों को यह भरोसा आया कि इस पलटन के जवान आसानी से जीत सकते हैं। तब टाइगर हिल पर जाने का आदेश मिला। फौजी और आम लोगों में वैसे तो कोई फर्क नहीं है। बस एक फर्क है, वह है सोच। आम नागरिक को कामयाबी मिल जाए तो वह 10 दिन काम नहीं करता। जश्न मनाता है। हमारी फौज हर दिन नई सफलता हासिल करती है, कुछ पल जश्न मनाती है और फिर दोबारा निकल पड़ती है। उसी का नतीजा था कि हमें टाइगर हिल पर जाने का मौका मिला।
 
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परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव - फोटो : अमर उजाला
सवाल- आपकी घातक प्लाटून कैसे बनी उसको क्या निर्देश मिले, कितनी ऊंची चढ़ाई आप चढ़ रहे थे?
जवाब-
'घातक प्लाटून' के नए और पुराने जवानों को चुनने की प्रक्रिया शुरू हुई। पहले हमारा काम था कि ऊपर लड़ रहे जवानों को राशन और रसद पहुंचाना। 22 दिन तक लगातार यह काम करने वाले जवानों से हमारी पहचान बनी। तब हमें 'घातक प्लाटून' का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला। टाइगर हिल की ऊंचाई 17 हजार फीट थी। दुश्मन हमारे मूवमेंट को देख सकता था। उसे चौंकाते हुए ही हम वहां पहुंच सकते थे। रातभर हम चलते थे, दिनभर पत्थरों में चुपचाप पड़े रहते थे। रात में माइनस 22 डिग्री तापमान होता था। चेहरों से खून टपकता था, ऊपर से गोलाबारी होती थी, लेकिन जवानों के पैर नहीं लड़खड़ाए। दो रात चले, फिर तीसरी रात का मंजर आज भी आंखों के सामने आता है। 90 डिग्री की चट्टान पर रस्सियों के सहारे चढ़ना असंभव प्रतीत हो रहा था। दुश्मन ने फायरिंग शुरू कर दी। हम सिर्फ सात जवान ऊपर चढ़ पाए। दुश्मन के बंकर को हमने उड़ा दिया और वहां बैठे पाकिस्तानियों को हमने मौत के घाट उतार दिया। वो 100 से ज्यादा जवान थे, हम केवल सात थे। हम पांच घंटे लड़े। लोग फिल्मों में देखते हैं कि गर्दनें कटती हैं, धड़ चलते हैं। मैंने उसे असल में देखा है। गोली लगने से सिर बाहर हो जाता है। हाथ अलग हो जाता है। किसी को सीने में गोली लगती है, फेफड़ों से खून की फुहारें शुरू हो जाती हैं। पाकिस्तानियों के एक बम से एक साथी की गर्दन कटकर दूर जाकर गिरती है। चारों तरफ खून ही खून था। सिर पर धड़ नहीं था, लेकिन हाथों से बंदूक नहीं छूटी। 

एक-एक कर तमाम साथी आंखों के सामने मां भारती की गोद में सो गए। मैं 19 साल का था, दो साल की सर्विस थी। वो साथी मेरे लिए सगे भाई से भी बढ़कर थे। वो साथी क्षत-विक्षत अवस्था में पड़े थे। आप समझ सकते हैं कि कैसी परिस्थिति होगी। तब भी हिम्मत नहीं हारी। सोचता रहा कि बदला कैसे लूंगा। दुश्मनों को लगा कि ये सब मर गए। वे पत्थर मारने लगे। ठोकर मारने लगे। चारों तरफ गोलियों की बौछार थी। राइफल उठाई, फायर किया और पांच पाकिस्तानियों को मौत के घाट उतार दिया। हाथ की हड्डी, पैर की मांसपेशियां निकलकर बाहर हो चुकी थीं। घिसट-घिसटकर, रेंग-रेंगकर फायर करता रहा और वहां से खदेड़ दिया। वापस आकर साथियों को बचाने की कोशिश की। नीचे वाले साथियों को सूचित करना था। यह नहीं पता था कि जाना है तो कहां जाना है। सोशल मीडिया वाले कहते हैं कि हमारे इतने मिलियन फॉलोअर हैं, लेकिन उनका क्या आत्मिक लगाव है? वो दुनिया से जुड़ रहे हैं, खुद से नहीं जुड़ रहे। 

हम हैं क्या, ये आज के लोगों को नहीं पता। हम शरीर नहीं हैं, हम आत्मा हैं। एक परमात्मा हमारे अंदर बैठा है, हमने उसे जानने की चेष्टा नहीं की। जब मैं अकेला रोता रहा तो खुद से जुड़ा। खुद से जुड़ा तो परमात्मा की याद आई और अंदर से आवाज आई कि नाले की तरफ जाओ। 500 मीटर लुढ़कर नीचे आया। साथियों को सूचना दी, फिर उस पहाड़ी पर हमारे साथियों ने हमला किया और बिना किसी के हताहत हुए हमने टाइगर हिल पर विजय पताका लहराई। टाइगर हिल टर्निंग पॉइंट थी। वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों, नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हों।

यह भी पढ़ें - Samwad 2025: 'रील और रियल लाइफ में बहुत फर्क है', 'संवाद' में बोले परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह
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सवाल- जब आपने सीने पर गोलियां झेलीं तो कैसा लगा?
जवाब- रील और रियल लाइफ में बहुत फर्क है। हमारी जिंदगी सोशल मीडिया नहीं, हमारी जिंदगी इस धरती पर कुछ और करने के लिए है। जब रील बनती हैं, जो इन्हें बनाने का वातावरण तो सैनिक ही देता है जो सरहदों पर देता है। दिन-रात, सदी-गर्मी-बरसात में उसके पैर नहीं डगमगाते, हाथ नहीं कंपकंपाते, नजरें नहीं डिगती हैं। जब पहला जख्म लगा था, तो ग्रेनेड का स्प्लेंडर लगा था। मुझे लगा था कि मेरा पैर दूर जाकर गिर गया है। हम जोश में भी होते हैं, होश में भी होते हैं। जहां जोश के साथ होश होगा, वहां मानसिक संतुलन होता है। मैंने हाथ से पकड़ा तो पता चला कि पैर तो है। तो मन में भरोसा हुआ कि थोड़ी चोट है। मसल्स फट गई हैं, बाकी ठीक है। 

सवाल- ऑपरेशन सिंदूर पर आप क्या सोचते हैं?
जवाब- सिंदूर भारतीय सनातन की परंपरा है। एक नारी मांग में सिंदूर पहनती है तो पत्नी बनती है, फिर मां बनती है। मां अपने गर्भ से एक संतान उत्पन्न करती है और वही संतान राष्ट्र की रक्षा करती है। जब आतंकियों ने सिंदूर उजाड़ा, तब सैनिकों ने कसम खाई थी कि जो हमारी बहनों का सिंदूर उजाड़ेगा, हम उसे उजाड़ देंगे। हमने 22 मिनट में पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया। 100 से ज्यादा आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह सिंदूर की शपथ थी।

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