Amar Ujala Samwad: अमर उजाला संवाद कार्यक्रम उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के होटल सैफर्ट सरोवर प्रीमियर में आयोजित किया गया है। अमर उजाला संवाद में देश की सम्मानित हस्तियां शिरकत कर रही है। इस कार्यक्रम में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव ने भी शामिल हुए हैं। इस दौरान उन्होंने युद्ध के दौरान सेना के शौर्य की गाथा बताई।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में अमर उजाला संवाद उत्तराखंड कार्यक्रम में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव ने भी शिरकत की है। योगेंद्र सिंह यादव का अमर उजाला संवाद के मंच पर भव्य स्वागत किया गया। इस दौरान कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों ने भारत माता की जय के नारे भी लगाए। इसके बाद परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव ने करगिल युद्ध के दौरान की सेना के शौर्य गाथा को लेकर अपने अनुभव साझा किए हैं।
सवाल- एक दुनिया है जो सिर्फ मोबाइल पर जीती है, और एक दुनिया है जो सरहद पर देश की रक्षा के लिए जीती है। रील और रियल लाइफ में अंतर को परिभाषित करने के लिए उस लम्हे को बताइए?
जवाब- रील और रियल लाइफ में बहुत फर्क है और फर्क हर जगह नजर आ जाता है। हमारी लाइफ सोशल मीडिया की नहीं है। हमारी लाइफ इस धरती पर कुछ और करने की है। रील बनाने का वातावरण सरहद पर खड़ा सैनिक देता हैं। जो दिन रात हर मौसम में सीमा पर खड़ा होता है। उसके पैर नहीं डगमगाते हैं, हाथ नहीं कंपकपाते हैं, नजरें नहीं झुकती हैं, बल्कि नजरों को सामने दुश्मनों पर टिका कर रखता हैं। तब देश की सीमाओं को सुरक्षा देता है, तब ये वातावरण बनता है, तब आप ये रील बना पाते हैं।
सवाल- कम उम्र में आपने राष्ट्रभक्ति का जज्बा दिखाया, सबसे ऊंचा सम्मान मिला। जंग के दौरान जब आपको पहली गोली लगी आप उसे यहां साझा करें?
जवाब- सबसे पहले जब पहला जख्म लगा था, तो एक ग्रेनेड का स्पेंलडर पैर में घुटने के नीचे लगा था। मुझे एक पल के लिए लगा था कि मेरा पैर कट कर के दूर जाकर गिरा है। मैं खड़ा था और एकदम से नीचे गिर गया है, लेकिन अगले ही पल, हम जोश में भी होते हैं और होश में भी होते हैं। जहां जोश के साथ होश होगा वहां आपका मानसिक संतुलन होगा। जहां जोश के साथ होश नहीं होगा, वहां मानसिक संतुलन भी नहीं होगा। मन में एकदम से आया देख यार पैर कटा है कि नहीं कटा है। तो पैर पर हाथ मारा तो पता चला कि पैर तो है। जब एकदम से लगा पैर तो है, मन में भरोसा हो गया कि कुछ नहीं हुआ, थोड़ा चोट लगा, मसल फटा है कोई बात नहीं...चलेगा। लेकिन आगे बढ़ना है यार अपने साथी के पास जाना है। क्योंकि मुझे अपने साथी की मदद के लिए जाना था, उसके ऊपर तीन तरफ से फायरिंग हो रही थी।
सवाल- आपको उस वक्त क्या निर्देश मिला था, आपकी घातक प्लाटून कैसे बनी उसको क्या निर्देश मिले, कितनी ऊंची चढ़ाई आप चढ़ रहे थे?
जवाब- हमने सबने करगिल को तो सुना है, कुछ लोगों ने देखा, कुछ लोगों ने जाना भी है। वो आज करगिल नहीं, वह असल में करगिल धाम है। वहां मां भारती के 527 बेटों ने अपने लहू से मां भारती की जीत का स्वर्णिम इतिहास रचा। हमने पहले तोरोलिम में 22 दिन जंग लड़ी। 12 जून 1999 को उस पहाड़ी पर कई जवानों के बलिदानों के बाद विजय पताका लहराई।
विज्ञापन
परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव
सिर्फ 19 साल की आयु में परमवीर चक्र प्राप्त करने वाली ग्रेनेडियर यादव सबसे कम उम्र के सैनिक हैं। कैप्टन योगेंद्र 18 ग्रेनेडियर्स के साथ कार्यरत कमांडो प्लाटून घातक का हिस्सा थे, जो चार जुलाई 1999 के शुरुआती घंटों में टाइगर हिल पर तीन सामरिक बंकरों पर कब्जा करने के लिए नामित की गई थी।
करगिल युद्ध में दिखाया था शौर्य
बंकर एक ऊर्ध्वाधर, बर्फ से ढके 1000 फुट ऊंची चट्टान के शीर्ष पर थे। यादव स्वेच्छा से चट्टान पर चढ़ गए और भविष्य में आवश्यकता की संभावना के चलते रस्सियों को स्थापित किया। आधे रास्ते में एक दुश्मन बंकर ने मशीन गन और रॉकेट फायर किया, जिसमें प्लाटून कमांडर और दो अन्य शहीद हो गए। गले और कंधे में तीन गोलियां लगने के बावजूद यादव शेष 60 फीट चढ़ गए और शीर्ष पर पहुंचे। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वह पहले बंकर में घुस गए।
विज्ञापन
टाइगर हिल पर किया था कब्जा
एक ग्रेनेड से चार पाकिस्तानी सैनिकों की हत्या कर दी और दुश्मन को स्तब्ध कर दिया। जिससे बाकी प्लाटून को चट्टान पर चढ़ने का मौका मिला। उसके बाद यादव ने अपने दो साथी सैनिकों के साथ दूसरे बंकर पर हमला किया और हाथ से हाथ की लड़ाई में चार पाकिस्तानी सैनिकों की हत्या की। इस तरह प्लाटून ने टाइगर हिल पर कब्जा कर लिया।