इसके बाद धवन ने कहा कि वह निर्मोही अखाड़ा के शेबियत(प्रबंधन व देखरेख का अधिकार) को चुनौती नहीं दे रहे है। हम यह मानते हैं कि 1858 से निर्मोही अखाड़ा बाहरी अहाते में पूजा करते थे। हमारा कहना है कि वर्ष 1946 में गुबंद केनीचे मूर्ति को रखा गया है, यह अवैध काम था। धवन ने कहा कि पहले यह यह अवैध काम करना नहीं चाहिए था। बाद में इसी अवैध काम के आधार पर वहां पर अधिकार का दावा नहीं ठोका जा सकता।
धवन ने कहा कि इस अवैध काम के कारण हमें उस जगह पर नमाज नहीं पढने दिया गया। धवन ने सवाल किया कि क्या इस अवैध काम के आधार पर वे(हिन्दू पक्ष) वहां पर दावा ठोक सकते हैं? पहले हिन्दू पक्ष मानते थे कि शुक्रवार को वहां पर नमाज पढ़ी जाती थी लेकिन अब वे इस बात से भी मुकर गए हैं। धवन ने कहा कि गैरकाननी काम कर कोई अधिकार का दावा नहीं कर सकता। कोई गलत हरकत का लाभ नहीं ले सकता।
सुनवाई केदौरान पीठ केसदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने सवाल किया कि क्या निर्मोही अखाड़े की याचिका पर सुनवाई की जानी चाहिए क्योंकि उनकेद्वारा निर्धारित समय के भीतर नहीं बल्कि बाद में याचिका दायर की है। जवाब ने कहा कि अगर लिमिटेशन(याचिका दायर करने केलिए समय सीमा) के आधार पर याचिका खारिज हो जाती है तो सवाल यह होगा कि ऐसी स्थिति मेंनिर्मोही अखाड़े को शेबियत का अधिकार का क्या होगा। हालांकि धवन ने कहा कि यह सही है 1885 से विवादित स्थल पर निर्मोही अखाड़ेळ् की मौजूदगी थी। धवन ने कहा कि वह निर्मोही अखाड़े शेबियत अधिकार को लेकर सहमत हैं। सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी।