अलीगढ़ में ढाई साल की मासूम की नृशंस हत्या ने देश को हिलाकर रख दिया है। कोई मानवीय संवेदनाओं की दुहाई दे रहा है तो कोई कानून के रक्षकों की लापरवाही का रोना रो रहा है। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और वूमेन पावर कनेक्ट की चेयरपर्सन डॉ. रंजना कुमारी का कहना है कि अलीगढ़ मर्डर केस में सवाल यह उठता है कि आखिर लोगों के मन में कानून का डर क्यों नहीं बैठ रहा है।
उनका कहना है कि संवेदनशीलता बिल्कुल खत्म हो गई है। चाहे देश की राजधानी में हुआ निर्भय केस हो या अलीगढ़ मर्डर केस, पुलिसिया कार्रवाई पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। दूसरा, समाज में हर तरफ आपाधापी है, कहीं पर सत्ता के लिए तो कहीं पैसे की खातिर। इन सबके बीच नैतिकता और संस्कार जैसी बातें तो कहीं खो गई हैं। नतीजा, आपके सामने है।
अमर उजाला डॉट कॉम से खास बातचीत में डॉ. रंजना कुमारी ने कहा कि आजादी के इतने दशकों बाद भी हमारे समाज में अलीगढ़ जैसी घटनाएं हो रही हैं। बच्चों के रेप पर फांसी तक का प्रावधान है, मगर फिर भी ऐसी दरिंदगी जारी है। इन सबके बीच सवाल यही उठता है कि लोगों के मन में कानून का भय क्यों नहीं है। इसका जवाब भी बड़ा सीधा सा है कि कानून समय पर अपना काम नहीं करता। कहीं एफआईआर दर्ज करने में देरी होती है तो कहीं फोरेंसिक जांच रिपोर्ट आने के चक्कर में अहम सबूत हाथ से निकल जाते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस मैजिस्ट्रेट के सामने बयान क्यों नहीं कराती।पुलिस के सामने जो बयान होते हैं, अदालत में वे बदल जाते हैं।
समाज में नन्ही बच्ची को टारगेट बनाना मानसिकता विकृत होने का परिचायक है। लोगों को सोचना होगा कि वे किस ओर जा रहे हैं। नैतिकता और संस्कारों को तो पहले ही तितांजलि दे दी गई है। जब इतना कुछ हो गया तो फिर सामाजिक संवेदनशीलता कहां से आएगी। मन में डर भी नहीं बैठेगा।
डॉ. रंजना कुमारी का मानना है कि देश में राजनीतिक संवेदनहीनता भी चिंता का विषय है। लॉ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी संबंधित प्रदेश की सरकार की बनती है। सरकार अगर कानून को सख्ती से लागू करने के बारे में सोचे तो ऐसे जघन्य अपराध थम सकते हैं, लेकिन 100 फीसदी ईमानदारी से। अगर आरोपी के खिलाफ अपराध से परे हटकर कुछ देखा तो फिर न्याय नहीं हो सकेगा। सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के लिए सरकार के अलावा हर वर्ग को आगे आना होगा।