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'बिना बताए डॉक्टर ने बच्चेदानी निकाल ली'

Tue, 05 Jul 2016 07:34 PM IST
विनीत खरे/बीबीसी
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पीडित - फोटो : BBC
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आठ साल पहले डॉक्टरों ने 'बिना बताए' 36 वर्षीय गीता दीवान के अंडाशय और बच्चेदानी निकाल ली। गीता आज तक सदमें में हैं। रोहतक के कलानौर इलाके में बिस्तर पर लेटी गीता बताती हैं, “डॉक्टर ने कहा, छोटा सा प्रोसीजर है, जल्द ही तू भागती फिरेगी। सात जुलाई 2008 को मेरा ऑपरेशन हुआ।
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ऑपरेशन के बाद मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई जब मुझे पता चला कि उन्होंने बिना बताए दोनों अंडाशय और बच्चेदानी निकाल ली।” उनके पति ने उनको छोड़ दिया। इलाज में सारी जमीन-जायदाद बिक गई। पास ही उनकी 14 साल की बेटी पुराने लैपटॉप पर मां के पुराने म्यूजिक वीडियो, तस्वीरें देख रही थी। तस्वीरों में गीता गुरुदास मान, हंसराज हंस के साथ नजर आ रही थीं। वो जमाना था जब गीता दिन के दो लाख तक कमा लेती थीं।

एक दिन वो ‘लेडीज प्राब्लम’ के इलाज के लिए लुधियाना के डॉक्टर अमित सोफट और डॉक्टर रमा सोफट के क्लीनिक पहुंचीं जहां ये घटना हुई। जांच के लिए बने डॉक्टरों के एक बोर्ड ने सोफट दंपत्ति के रजिस्ट्रेशन रद्द करने की सिफारिश करते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि डॉक्टरों ने मेडिकल कारणों के अलावा दूसरे कारणों के लिए ये कार्यवाही की है।”
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पत्रकार से बातचीत में डॉक्टर अमित सोफट ने चिकित्सीय लापरवाही से इनकार किया और गीता दीवान पर पैसे की मांग का आरोप लगाया। डॉक्टर अमित का दावा था उनके पास गीता का हस्ताक्षर किया सहमति पत्र है। उन्होंने इस संबंध में दस्तावेज ईमेल करने का वादा भी किया लेकिन वो दस्तावेज हमें नहीं मिले।

चिकित्सीय भूल के कारण हुई दुर्घटना में कितने साल की मानवीय जिंदगी का नुकसान होता है

अस्पताल - फोटो : BBC
वर्ष 2013 के एक शोध के मुताबिक दुनिया में हर साल करीब 4.3 करोड़ लोग असुरक्षित चिकित्सकीय देखरेख के कारण दुर्घटना का शिकार होते हैं। रिपोर्ट में पहली बार ये पता लगाने की कोशिश की गई थी कि चिकित्सीय भूल के कारण हुई दुर्घटना में कितने साल की मानवीय जिंदगी का नुकसान होता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में रिपोर्ट के लेखक आशीष झा ने बताया कि भारत में हर साल करीब 30 लाख साल की स्वस्थ जिंदगी मेडिकल चूक का शिकार होती है हालांकि जानकारी के अभाव में ये बात पुख्ता तौर पर नहीं कही जा सकती।

1998 में सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर की लापरवाही मामले में कोलकाता के एक अस्पताल को आदेश दिया था कि वो कुनाल साहा को एक मिलियन डॉलर्स का जुर्माना अदा करें। कुनाल की पत्नी अनुराधा की मृत्यु गुर्द की खराबी के कारण हुई थी। भारत में किसी अस्पताल के खिलाफ ये सबसे बड़ा जुर्माना है, लेकिन अभी भी शिकायतें कई हैं।

स्वास्थ्य मामलों पर काम करने वाले प्रवीन डांग के मुताबिक हालांकि डॉक्टरों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई के लिए नियामक संस्था है, "डॉक्टर दूसरे डॉक्टरों पर कार्रवाई नहीं करना चाहते।" प्रवीन डांग कहते हैं, "जब मैंने पहली बार एक डॉक्टर की शिकायत के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को पत्र भेजा था तो उसका 15 दिनों में जवाब आ गया था। आज उस बात को तीन साल हो गए हैं। आज तक राज्य काउंसिल जांच पूरी नहीं कर पाई है।"

स्वास्थ्य सुविधाएं खस्ताहाल होने के कारण निजी अस्पतालों का 80 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है

आंकड़े - फोटो : BBC
भारत में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं खस्ताहाल होने के कारण निजी अस्पतालों का 80 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है। आरोप लग रहे हैं कि कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन के कारण निजी अस्पतालों के जवाबदेही की भारी कमी है।

 डॉक्टर अरुण गदरे और डॉक्टर अभय शुक्ला ने अपनी किताब ‘डिसेंटिंग डायग्नोसिस’ में निजी अस्पतालों के भ्रष्टाचार का जिक्र किया है। निजी अस्पतालों में पैसे हड़पने के लिए लोगों को बीमारी के नाम पर डराया जाता है, उन्हें वो टेस्ट करने को कहा जाता है या फिर उन पर वो सर्जरी और ऑपरेशन किए जाते हैं जिसकी कोई जरूरत नहीं होती।

साथ ही उन्होंने डॉक्टरी पेशे में कमीशन के चलन की चर्चा की है, यानि डॉक्टरों की दवा कंपनियों या डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच कमीशन को लेकर सांठगांठ। मार्च 2016 में अमरीका की 'प्रोपब्लिका' में छपी रिपोर्ट के अनुसार जिन डॉक्टरों को मेडिकल उद्योग से धन मिलता है वो कंपनी के ब्रैंड के पक्ष में दवाइयां लिखते हैं।

जिन पांच को मेडिकल कंपनियों की ओर से सबसे ज़्यादा धन मिला, उनमें से दो भारतीय मूल के थे। उधर डॉक्टर और वकील एमसी गुप्ता डॉक्टरी पेशे में भ्रष्टाचार का कारण महंगी पढ़ाई और सरकार के नीम-हकीम के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने को जिंमेदार ठहराते हैं। 

भारत जहां स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1।3 प्रतिशत खर्च होता है

पीड़ित - फोटो : BBC
वो कहते हैं, "भारत जहां स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1.3 प्रतिशत खर्च होता है, वहां ऐसी हालत के लिए सरकार जिम्मेदार है।" इसके बावजूद दुनिया के कोने-कोने से लोग इलाज के लिए भारत पहुंच रहे हैं और कई खुश होकर वापस लौट रहे हैं। लेकिन नाइजीरिया की चिनेये का मामला अलग है।

अगस्त 2015 में एक दुर्घटना में चोटिल हुए पांव का इलाज करवाने आईं चिनेये को दिल्ली के फोर्टिस में दाखिल किया गया। अक्टूबर में उनकी मृत्यु हो गई। चिनेये को लेकर सोशल मीडिया, ब्लॉग आदि में लिखा गया है लेकिन चिनेये के परिवार के मुताबिक उन्हें अस्पताल ने नहीं बताया कि चिनेये की मौत कैसे हुई।

ट्विटर पर @Justice4Chineye नाम का एक हैंडल भी है। कनाडा से बात करते हुए चिनेये की बहन एनकीरू ऑनवुगालू ने आरोप लगाया कि चिनेये की मृत्यु मेडिकल लापरवाही का मामला है। चिनेये की सर्जरी से जुड़े रहे डॉक्टर धनंजय गुप्ता ने बताया कि अटॉप्सी रिपोर्ट पुलिस के पास है और परिवार को पुलिस से बात करनी चाहिए।

डॉक्टर गुप्ता ने अस्पताल के प्रशासनिक प्रमुख संदीप गुर्थू से बात करने को कहा लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। मामले के जांच कर रहे सब इंस्पेक्टर संदीप कुमार ने बताया कि मौत के कारण फोर्टिस के डॉक्टर बताएंगे न कि वो।

एनकीरू ऑनवुगालू बेहद नाराज हैं। वो कहती हैं, “मैं किसी को भी भारत जाने की सलाह नहीं दूंगी। अस्पताल कोई जवाब नहीं दे रहा है जो निर्दयता की इंतहा है। अगर अस्पताल का दावा है कि उनके पास रिपोर्ट नहीं है और सिर्फ पुलिस के पास ये रिपोर्ट है,
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अगर आप मेडिकल लापरवाही के खिलाफ उपभोक्ता अदालत जाना चाहें तो आसान नहीं

पीड़ित - फोटो : BBC
अस्पताल को मौत के कारणों का कैसे पता चलेगा? वो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कैसे कदम उठाएंगे?” आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही सामने आएगी लेकिन अस्पतालों पर मरीज के साथ पारदर्शिता न बरतने के आरोप पुराने हैं। अगर आप मेडिकल लापरवाही के खिलाफ उपभोक्ता अदालत जाना चाहें तो आसान नहीं।

कम से कम आयुर्वेद की डॉक्टर इंदु शर्मा यही कहती हैं। वर्ष 2015 में नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रसेल कमीशन (एनसीडीआरआसी) ने शर्मा दंपत्ति को कथित डॉक्टरी चूक के लिए एक करोड़ का हर्जाना दिया। इंदु ने दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल पर आरोप लगाया था कि वहां कथित डॉक्टरी चूक के कारण 1999 में उनके बच्ची मानसिक विकलांगता का शिकार हुई। अस्पताल ने फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है।

इंदु को निष्ठा के पैदा होने के डेढ़ साल बाद विकलांगता का पता चला। वो बताती हैं, “पैदा होने के बाद से ही उसे दौरे आने शुरू हो गए। सीटी स्कैन में पता चला कि उसका आधे से ज्यादा दिमाग काम नहीं कर रहा है।” 2012 में निष्ठा की मौत हो गई। इंदु कहती हैं, “मदद के अभाव में लोग अदालत जाने का सोच भी नहीं पाते।

मैंने अपना पेशा छोड़ दिया। इस केस में मेरी पूरी जिंदगी बीत गई है।” इंदु शर्मा के वकील और मेदांता अस्पताल से जुड़े मधुकर पांडे कहते हैं कि चिकिस्तयीय चूक को साबित करना सबसे मुश्किल है और सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मेडिकल बोर्ड के गठन की बात कही है।

वो कहते हैं, "अलग-अलग मानवीय शरीर अलग अलग तरह से व्यवहार करता है और हर मौत पर ये समझना कि ये डॉक्टर की लापरवाही का नतीजा होगा, गलत है। "वकील महेंद्रकुमार बाजपेई को चिंता है कि मरीज और डॉक्टर के बीच विश्वास तेजी से घट रहा है।
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