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अमेरिकी विश्वविद्यालयों का फरमान: कोवाक्सिन, स्पुतनिक वी लेने वाले भारतीय छात्र फिर से टीका लें

Sun, 06 Jun 2021 07:02 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • अमेरिकी विश्वविद्यालयों की टीकाकरण नीति ने लाखों भारतीय छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
  • अमेरिकी विश्वविद्यालयों का फरमान है कि भारत में कोवाक्सीन या स्पूतनीक वी टीक लेने वाले छात्र फिर से अमेरिकी कंपनियों का टीका लगवाएं।
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कोरोना वैक्सीन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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कोरोना महामारी के दौर में अमेरिकी विश्वविद्यालयों की कोरोना टीकाकरण नीति ने भारत समेत विदेशी छात्रों को परेशानी मे डाल दिया है। भारत में कोवाक्सिन या स्पूतनिक वी टीका लगवा चुके भारतीय छात्रों को अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने फिर से टीका लगावाने के लिए कहा है।

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अमेरिका के सभी विश्वविद्यालय छात्रों को फिर से टीकाकरण करने के लिए कह रहे हैं, यदि उन्हें कोविड-19 के खिलाफ वैसे टीके लगाए गए हैं जिन्हें अभी तक विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मंजूरी नहीं मिली है। इसमें भारतीय छात्र भी शामिल हैं जिन्होंने भारत बायोटेक का कोवाक्सिन या रूसी वैक्सीन स्पुतनिक वी लगवाया है।

अमेरिकी विश्वविद्यालय इन टीकों की प्रभावकारिता और सुरक्षा पर डाटा की कमी को इसका कारण बता रहे हैं। संबंधित छात्रों को शरद ऋतु में होने वाले सेमेस्टर के शुरू होने से पहले पुन: टीकाकरण करने के लिए कहा जा रहा है।
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दो अलग-अलग टीके लेने से सुरक्षा को लेकर चिंता
विश्वविद्यालयों के इस आदेश के बाद ये छात्र दो अलग-अलग टीके लेने से सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। 25 साल की मिलोनी दोशी जो कोलंबिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स को ज्वाइन करने वाली है। उसे भारत में पहले ही कोवाक्सिन की दो खुराकें दी जा चुकी हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने उसे कॉलेज परिसर में आने पर फिर से टीकाकरण कराने के लिए कहा है।

इस पर दोशी का कहना है कि 'मैं सिर्फ दो अलग-अलग तरह के टीके लेने को लेकर चिंतित हूं। उन्होंने कहा कि आवेदन प्रक्रिया चक्र का सबसे कठिन हिस्सा होगा, लेकिन वास्तव में यह सब अनिश्चित और चिंता पैदा करने वाला रहा है।'

छात्रों के सामने आ रही इस तरह की चिंता पर, अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के प्रवक्ता क्रिस्टन नोर्डलंड ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि 'चूंकि कोविड-19 टीके विनिमेय (इंटरचेंजेबल) नहीं हैं, इसलिए दो अलग-अलग टीकों को लेने से सुरक्षा और प्रभावशीलता का अध्ययन नहीं किया गया है।'

विश्वविद्यालयों के निर्णय का प्रभाव
छात्रों के लिए डब्ल्यूएचओ-अनुमोदित टीकों के साथ टीकाकरण को अनिवार्य करने की प्रक्रिया से अमेरिकी विश्वविद्यालयों के राजस्व को नुकसान होने की संभावना है, जो हर साल शिक्षण शुल्क से लगभग 28.5 खरब रुपये  (39 बिलियन डॉलर) कमाते हैं।

लगभग दो लाख भारतीय छात्र हर साल अमेरिकी विश्वविद्यालयों में जाते हैं। उनमें से कई को अब अपने विश्वविद्यालयों द्वारा अनुमोदित टीकों के साथ टीकाकरण के लिए नियुक्तियों को निर्धारित करना मुश्किल हो रहा है। वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इस नए नियम का उनकी भविष्य की योजनाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।

बता दें कि डब्ल्यूएचओ द्वारा अब तक स्वीकृत कुछ टीकों में अमेरिका की दवा कंपनियों फाइजर इंक, मॉडर्ना इंक और जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा उत्पादित टीके शामिल हैं।

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