डोनाल्ड ट्रंप ने शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर से मुलाकात की। इनसेट- पीएम नरेंद्र मोदी
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ बम गिरना जारी है। अपने ताजा आदेश में ट्रंप ने ब्रांडेड/पेटेंट दवाओं के आयात पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का एलान किया। इसका बड़ा असर भारत पर होगा। वहीं, दूसरी ओर अमेरिका और पाकिस्तान के बीच मेल मुलाकात का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। ताजा मामला डोनाल्ड ट्रंप का पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर से मिलने का है।
टैरिफ से जुड़े ट्रंप के नए एलान का भारत के फार्मा सेक्टर पर कितना असर पड़ेगा?, टैरिफ और भारत-पाकिस्तान रिश्तों का भी कोई कनेक्शन है क्या?, क्या अमेरिका और भारत के रिश्ते 1971 के दौर में लौट गए हैं?, पाकिस्तान के साथ इतनी नजदीकी क्यों बढ़ रही? आइए समझते हैं…
ट्रंप ने अब क्या किया है?
अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दवाइयों, किचन कैबिनेट, बाथरूम वैनिटी, गद्देदार फर्नीचर और भारी ट्रकों पर नए आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि दवाइयों पर 100 फीसदी, किचन कैबिनेट और बाथरूम वैनिटी पर 50 फीसदी, फर्नीचर पर 30 फीसदी और भारी ट्रकों पर 25 फीसदी आयात कर लगाया जाएगा। ये सभी शुल्क 1 अक्तूबर से लागू हो जाएंगे। यह टैरिफ केवल ब्रैंडेड और पेटेंट दवाओं के लिए है, जेनरिक दवाओं पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। यह टैरिफ उन कंपनियों पर नहीं लगेगा जो अमेरिका में अपनी दवा बनाने वाला प्लांट लगा रही हैं। अगर इनका निर्माण भी शुरू हो गया है तो वे टैरिफ से बच सकते हैं।
टैरिफ का भारत के फार्मा सेक्टर पर कितना असर पड़ेगा?
दवाओं के आयात पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने के फैसले का भारत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। खासकर देश के दवा निर्माण उद्योग पर। बीते वित्त वर्ष में भारतीय उद्योगों की तरफ से दुनिया को करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये (27.9 अरब डॉलर) की दवाओं का निर्यात हुआ था। इसमें अमेरिका को ही करीब 77 हजार करोड़ रुपये (8.7 अरब डॉलर) की दवाएं निर्यात हुई थीं।
भारत के दवा निर्माताओं के लिए अमेरिका सबसे बड़ा बाजार रहा है। 2025 के पहले छह महीनों में ही अमेरिका को कुल 32 हजार 505 करोड़ रुपये (3.7 अरब डॉलर) की दवाओं का निर्यात हो चुका है। ऐसे में 100 फीसदी टैरिफ लगने से अमेरिका में भारत की सस्ती दवाएं भी महंगी दरों पर बिकेंगी। जिन कंपनियों पर इस टैरिफ का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है, उनमें डॉ. रेड्डीज, सन फार्मा, लुपिन समेत कई कंपनियां शामिल हैं।
क्या सभी देशों से आने वाली दवाओं पर इतना ही टैरिफ लगा है?
रॉयटर्स के अनुसार ट्रंप के इस टैरिफ से शायद वह देश बच सकते हैं जिनके साथ अमेरिका के व्यापार समझौते में टैरिफ को सीमित रखने का प्रावधान शामिल हैं। जापान, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौतों में विशिष्ट उत्पादों जैसे ऑटो, सेमीकंडक्टर और फार्मास्यूटिकल्स के लिए टैरिफ शुल्क की सीमा को तय करते हैं। जिसका मतलब है कि नए टैरिफ शुल्क समझौते के दौरान तय किए गए शुल्क से ऊपर नहीं जाएंगे। इसके अलावा जितने भी देश अमेरिका को दवाओं का निर्यात करते हैं वह इस टैरिफ से नहीं बच पाएंगे।
टैरिफ को लेकर अब तक क्या-क्या कर चुके हैं ट्रंप?
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने टैरिफ को बढ़ाया है। अमेरिका भारत पर पहले से ही 25% टैरिफ लगा रहा था। इसके बाद भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद से जुड़े जुर्माने के तौर पर 6 अगस्त 2025 को ट्रंप ने अतिरिक्त 25% टैरिफ का आदेश दिया। यह दोनों टैरिफ मिलाकर 50% हो गया, जिसे 27 अगस्त से लागू किया गया। इसके चलते अमेरिका को भेजे जाने वाले उत्पाद अब अमेरिका में महंगे हो गए हैं। भारत का कहना है कि रूस से कारोबार करने के लिए ट्रंप प्रशासन बेवजह हमें निशाना बना रहा है, जबकि यूरोप के कई देश और खुद अमेरिका तक रूस से कारोबार कर रहा है।
इसके बाद अब एक बार फिर ट्रंप ने टैरिफ में बढ़ोतरी की है। इसमें उन्होंने दवाइयों पर 100 फीसदी, किचन कैबिनेट और बाथरूम वैनिटी पर 50 फीसदी, फर्नीचर पर 30 फीसदी और भारी ट्रकों पर 25 फीसदी टैरिफ लगाया है। हालांकि यह बढ़ोतरी केवल भारत के लिए नहीं है।
टैरिफ और भारत-पाकिस्तान रिश्तों का भी कोई कनेक्शन है क्या?
अमेरिका और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां सीधे तौर पर भारत को प्रभावित करती है। कई मौकों पर ऐसा लगता है कि ट्रंप का भारत पर टैरिफ लगाने का फैसला पाकिस्तान समर्थित है। इस पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के प्रोफेसर डॉ. संजय पांडे ने बताया कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि वह उसकी विदेश नीति को प्रभावित करे। लेकिन यह जरूर है कि भारत पर अमेरिका के टैरिफ लगाने के बहुत कारण हो सकते हैं। जिसे केवल रूस से तेल खरीदना ही समझा जा रहा है। इसके पीछे एक कारण डॉ. संजय पांडे ने बताया कि अमेरिका भारत को कृषि के उत्पाद भेजना चाहता है लेकिन यह भारत के किसानों पर विपरीत प्रभाव डालेगा। इसे अमेरिका भारत के खिलाफ एक हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल कर रहा है, ताकि भारत और रूस में दूरी बनाई जा सके। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे और हमसे महंगे दाम पर तेल खरीदे। इसके पीछे एक और कारण भारत-पाकिस्तान का संघर्ष भी हो सकता है, जिसमें अमेरिका ने कई बार यह कहा कि हमने भारत-पाकिस्तान का युद्ध रुकवा दिया। लेकिन भारत ने कभी भी अमेरिका की यह बात नहीं मानी, इससे भी नाराज होकर ट्रंप का टैरिफ कार्ड हो सकता है।
शहबाज शरीफ और मुनीर मिलते हैं और टैरिफ बढ़ जाता है ऐसा केवल इत्तेफाक या कोई कूटनीति?
डॉ. संजय पांडे कहा, "शहबाज शरीफ और मुनीर के मिलने के बाद टैरिफ का बढ़ना केवल इत्तेफाक भर ही है। टैरिफ के बाद एच1बी वीजा की भी फीस बढ़ी। इसके पीछे का कारण अमेरिकी लोगों का हित सोचना ही है। क्योंकि एच1बी वीजा की आपत्ति नई नहीं है। ट्रंप और कुछ अन्य अमेरिकी नेताओं का मानना है कि ये भारतीय आईटी प्रोफेशनल का एक जरिया बन गया है अमेरिका में प्रवेश करके उनकी नौकरियां लेने का। अमेरिका शुरू से महाशक्ति रहा है। लेकिन हाल फिलहाल में उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध, इस्राइल फलस्तीन युद्ध, रुकवाने में सफलता नहीं मिली। भारत-पाक संघर्ष चार दिन चला, उसके बाद पाकिस्तान अमेरिका साथ खड़ा हो गया। इसमें अमेरिका के पास मौका है वह इस संघर्ष को रुकवाने का दावा करे और खुद की महाशक्ति वाली छवि एक बार फिर पेश करे।
क्या अमेरिका और भारत के रिश्ते 1971 के दौर में लौट गए हैं?
1971 के भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान अमेरिका ने बैक डोर से पाकिस्तान की मदद की थी। और अब 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब पूरी दुनिया को भारत ने यह दिखाया कि पाकिस्तान आतंकवाद को पनाह देने वाला देश है। उसके बाद भी अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या भारत अमेरिका के रिश्ते वापस 1971 के दौर में लौट रहे हैं?
इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ. संजय पांडे ने कहा, 'उस समय शीत युद्ध चल रहा था, दुनिया दो ध्रुवों में बटी हुई थी। इसमें से एक सोवियत संघ था, जिसके साथ भारत ने उस समय एक मैत्री संधि की थी। इस समय स्थितियां पहले जैसे नहीं है। लेकिन अगर दोनों देशों के करीब आने के सवाल को देखा जाए तो 1954 में अमेरिका-पाकिस्तान ने पारस्परिक रक्षा सहायता समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसने सैन्य सहायता के लिए दरवाजे खोले और पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार मिलने लगे। तब से ही अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा है। 2000 में जब क्लिंटन भारत आए थे तब से भारत के साथ अमेरिका में सुधार हुआ था।'
डॉ. संजय पांडे ने ट्रंप की पाकिस्तान के नजदीक जाने के कुछ रणनीतिक कारण बताए जिसमें से अफगानिस्तान का नजदीक होना, चीन के साथ उसका अच्छा सहयोग और मध्य पूर्व में मुस्लिम देशों का अमेरिका खिलाफ होना। इन सबके बीच अमेरिका एक ऐसे मुस्लिम देश पर पकड़ बनाए रखना चाहता है, जिसके पास सैन्य शक्ति भी है और परमाणु हथियार भी है। लेकिन इसे भारत के 1971 वाली स्थिति नहीं माना जा सकता क्योंकि इस समय शक्ति संतुलन और स्थिति आज के समान नहीं थी।
पाकिस्तान के साथ इतनी नजदीकी क्यों बढ़ रही?
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर संजय पांडेय ने तीन अहम कारण बताए..
1. अफगानिस्तान पर नजर रखना: अफगानिस्तान में जो स्थितियां हैं उस पर काबू रखने या नजर रखने के लिए पाकिस्तान जरूरी है। बगराम में अगर अमेरिका काबू पाने में सफल हो जाता है, तो सेना तक सुविधा पहुंचाने के लिए पाकिस्तान एक सुविधाजनक रास्ता है।
2. चीन पर नजर रखने के लिए: चीन पर नजर रखने या फिर संबंध सुधारने हैं तो भी पाकिस्तान जरूरी है। इससे पहले 1970, 1971 और 1972 में भी पाकिस्तान से चीन और अमेरिका के संबंध सुधारने में मदद की थी।
3. मध्य पूर्व और भारत के लिए: ईरान, इस्राइल, गाजा, इराक, सीरिया, यमन जैसे मध्य पूर्व देशों में चल रहे संघर्षों पर भी अगर अमेरिका को नजर रखनी है तो पाकिस्तान ट्रंप के लिए जरूरी है। इसके अलावा भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान से अमेरिका नजदीकी रख सकता है।
क्या अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस भी ट्रंप की दोस्ती का हिस्सा है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही के अपने बयान में बगराम एयरबेस को फिर से हासिल करने की बात कही है। डॉ. संजय पांडे इस पर बताते हैं कि 1971 में अमेरिका चीन से दोस्ती करना चाहता था। लेकिन आज संबंधों को स्थायित्व रखते हुए उस पर अंकुश भी लगाना है। चीन, मध्य पूर्व और अफगानिस्तान सभी पर एक दबाव बनाए रखने के लिए पाकिस्तान अमेरिका के लिए जरूरी है।