‘अर्बन नक्सल’ को लेकर छिड़ रही बहस के बीच नक्सल प्रभावित इलाकों में काम करने वाली एक संस्था ‘पीपुल फॉर नेशन’ ने इस पर अपनी रिपोर्ट जारी की है। अपनी रिपोर्ट में कहा कि माओवादियों ने हजारों आदिवासियों के जीवन को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ की तुलना इस्लामिक स्टेट और तालिबान से की है। संस्था ने अपनी रिपोर्ट में नक्सल प्रभावित इलाकों की एरिया मैपिंग कराने पर जोर दिया है।
नक्सलियों का सिस्टम पर भरोसा नहीं
मंगलवार को नई दिल्ली में ‘नो योर अर्बन नक्सल्स’ विषय पर आयोजित कांफ्रेंस में संस्था ने नक्सल प्रभावित इलाकों पर अपनी रिपोर्ट जारी की। कांफ्रेंस में बोलते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसआरसीसी कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर अभिनव प्रकाश ने ‘अर्बन नक्सल’ पर बोलते हुए कहा कि नक्सली जानते हैं कि लोकतंत्र के सारे स्तंभ शहरों में ही केंद्रित हैं। नेता, सांसद, अधिकारी और प्रोफेसर सभी शहरों में ही रहते हैं। उन्होंने कहा कि नक्सली सिस्टम में भरोसा नहीं करते बल्कि वे सिस्टम को उखाड़ फेंकने में भरोसा करते हैं।
नहीं सामने आती सही तस्वीर
‘पीपुल फॉर नेशन’ ने बताया कि उनकी 11 सदस्य टीम ने 14 से 18 जून के बीच छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों का दौरा किया। अपनी रिपोर्ट में बताया कि नक्सल प्रभावित बस्तर जिले की सही तस्वीर दुनिया के सामने नहीं आ पा रही है। नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले केवल लोगों के मारे जाने या जानमाल के नुकसान की खबरें ही पेश करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक माओवादी नहीं चाहते कि आदिवासियों के बच्चे पढ़े-लिखें, इसलिए उन्होंने 320 से ज्यादा स्कूलों की बिल्डिंग्स को तोड़फोड़ दिया है। साथ ही आदिवासी इलाकों तक पहुंच बनाने के लिए बनी नवनिर्मित सड़कों को भी बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचाया है।
सरकारों ने अनदेखा किया
रिपोर्ट मे कहा गया है कि पहले दो दशकों तक केंद्र में बैठी सरकारों के पास माओवादियों से निबटने के लिए कोई कारगर रणनीति ही नहीं थी। 2005-2006 के बाद सरकारों ने इस पर संज्ञान लिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लेकिन पिछले एक दशक में माओवादियों के नियंत्रण वाला क्षेत्र 20 हजार किमी से घटकर 5 हजार किमी हो गया है।
नक्सली घटनाओं में आई कमी
रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010 के मुकाबले 2016 में माओवादी गतिविधियों में लगातार कमी दर्ज हुई है। 2010 में जहां 2204 नक्सली घटनाएं हुईं, वहीं 2016 में यह घटकर 1048 हो गईं। वहीं 2010 में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे नक्सलीरोधी अभियान में 33 नक्सली मारे गए, जबकि 2016 में यह संख्या बढ़ कर 222 पहुंच गई। वहीं, पहले 265 माओवादियों ने सरेंडर किया, जबकि 2016 में 1442 हो गई। साथ ही नक्सल प्रभावित 8 राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल में 2010 में 998 नक्सली घटनाएं हुईं, जबकि 2016 में यह आंकड़ा मात्र 278 रहा।
स्थानीय लोगों को सशक्त बनाएं
पीपुल फॉर नेशन ने अपनी रिपोर्ट में कुछ सिफारिशें भी की हैं। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में स्थानीय लोगों को सशक्त बनाया जाए। इस लड़ाई में स्थानीय लोगों की अहम भूमिका है और उन्हें दुश्मन के इरादों और उनकी सोच के बारे में स्थानीय लोगों को बताया जाए। साथ ही वहां शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण जैसे अहम मुद्दों पर काम कर रहे सामाजिक संगठनों को इस मुहिम में शामिल किया जाए। सरकार की विचारधारा से अलग इन सामाजिक संगठनों के जरिए शांति, विकास और नए विचारों को स्थानीय समाज के समक्ष रखा जाए। साथ ही, आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों के पुर्नवास कार्यक्रम को जारी रखने की सिफारिश की है।