सीबीआई (माओवाद) का अर्बन (शहरी) मॉड्यूल जंगलों और दूर दराज के इलाकों में कार्रवाई करने वाले नक्सलियों के गुरिल्ला आर्मी से ज्यादा खतरनाक और गहरे जड़ वाले हैं।
देश के बड़े शैक्षणिक, स्वास्थ्य, न्यायिक और अन्य नामचीन संस्थानों में अर्बन मॉड्यूल ने गहरी पैठ बना ली है। अर्बन मॉड्यूल का गुरिल्ला आर्मी के साथ ठोस संपर्क है। गृहमंत्रालय के नक्सल मैनेजमेंट और खुफिया विभाग को पिछले कुछ सालों में इस नेटवर्क की पुख्ता जानकारी हासिल की है।
गृहमंत्रालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हलफनामें में सीपीआई (माओवाद) के अर्बन मॉड्यूल का विस्तार से जिक्र है। खुफिया विभाग के शीर्षस्थ सूत्रों ने अमर उजाला को बताया कि नक्सली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजीव गांधी के तर्ज पर हत्या की साजिश को भले कभी अंजाम ना दे पाएं। लेकिन इनके मंसूबे को हल्के में लिए जाने की भूल नहीं की जा सकती।
सूत्रों के मुताबिक कम्यूनिटी मेडिसिन के विशेषज्ञ कोबाद गांधी और दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी के प्रोफेसर साई बाबा की गिरफ्तारी के बाद नक्सल मैनेजमेंट और खुफिया विभाग ने इसके बारे में अहम जानकारियां हासिल की है। लेकिन इनके जड़ तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक कोबाद गांधी और साईबाबा अर्बन मॉड्याल का पुख्ता उदाहरण हैं।
सूत्रों ने बताया कि गुरिल्ला आर्मी के रेड कॉरिडोर की तरह अर्बन मॉड्यूल भी देश में तीन कॉरिडोर बना कर काम कर रहा है। पुणे-मुंबई-अहमदाबाद को इन्होंने गोल्डन कॉरिडोर का नाम दिया है। इसी तरह दिल्ली-कानपुर-पटना-कोलकाता गंगा कॉरिडोर और चेन्नई-कोयंबटूर- बंगलुरू को ट्राई जंक्शन का नाम दिया गया है। कॉरिडोर में बंटे इन शहरों के शैक्षणिक और न्यायिक संस्थानों में अर्बन मॉड्यूल की जड़े खासी गहरी है। यह मॉड्यूल विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच खासा सक्रिय है।
सूत्रों के मुताबिक यह मॉड्यूल शहरों में आर्थिक विषमता और जाति केभेदभाव को हथियार बना कर आम जनता और बुद्धिजीवियों केबीच अपनी पैठ बनाता है। इसकेलिए कई स्वयंसेवी संस्थान (एनजीओ) भी गुपचुप तरीके से काम करते हैं। गृहमंत्रालय के एनजीओ की फंडिंग केखिलाफ चल रही जांच में इसका खुलासा हुआ है।