27 साल से यूपी की सत्ता से दूर कांग्रेस के लिए समाजवादी पार्टी से गठबंधन बेहद जरूरी था। इसके लिए वजह स्पष्ट हैं। सपा के साथ गठबंधन से कांग्रेस को संजीवनी मिल गई है। गठबंधन में कांग्रेस को 105 सीटें मिली हैं। इनमें पहले व दूसरे चरण के चुनाव में कुल 41 सीटें मिली हैं। यदि गठबंधन न होता तो कांग्रेस की सबसे ज्यादा फजीहत होती। वह अकेले दम पर 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थी।
कांग्रेस शुरू से ही गठबंधन की आस लगाए बैठी थी। पार्टी को यह अंदाजा था कि यदि उसे अपने दम पर चुनाव लड़ना पड़ा तो और फजीहत होगी। पार्टी की तैयारियों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई विधानसभा क्षेत्रों में उसके पास ढंग के उम्मीदवार तक नहीं थे। इस कारण कांग्रेस यह शुरू से चाहती थी कि उसका गठबंधन हो जाए।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने रालोद के साथ समझौता कर चुनाव लड़ा था। इस कारण पार्टी को 11.65 फीसदी मत मिले थे। इससे कांग्रेस को 29 सीटें मिलीं। जबकि 31 प्रत्याशी दूसरे स्थान पर आए। इसके बाद अधिकतर प्रत्याशी तीसरे, चौथे व पांचवें स्थान पर आने के लिए ही संघर्ष करते रहे। 2014 का लोकसभा चुनाव देखा जाए तो उसमें कांग्रेस को मात्र 7.5 फीसदी वोट मिले थे। पार्टी को केवल दो सीटें ही मिली थीं।
इसके पहले के भी चुनाव देखे जाएं तो उसमें कांग्रेस को सात फीसदी से 15 फीसदी के बीच वोट मिलते आए हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह लग रहा था कि सात से 10 फीसदी वोट के भरोसे उसकी सीटें दहाई का अंक भी पार नहीं कर पाएंगी। इस कारण कांग्रेस ने इस बार सूबे के सत्ताधारी दल सपा का दामन थामा है।