हाल के दिनों में अमित शाह जब नरेंद्र मोदी से मिलते हैं, तो प्रधानमंत्री शाह से कई बार एक ही सवाल पूछते हैं, जिसका जवाब देना बीजेपी अध्यक्ष के लिए मुश्किल होता है। नरेंद्र मोदी का सवाल होता है कि 'बहन जी क्या सोच रही हैं?'
60 वर्षीय मायावती की रणनीतियों के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यग्रता उनकी चिंता को दर्शाती है। मोदी सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद भारत का एक बड़ा वर्ग विकास की चकाचौंध से दूर अंधेरे में डूबा हुआ है, तो अल्पसंख्यक समुदाय सामाजिक तनाव को लेकर चिंतित हैं।
मायावती के समर्थक देवी की तरह उनकी पूजा करते हैं। समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े मायावती के समर्थक मोदी के लिए चिंता की बड़ी वजह हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में मायावती, मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
मोदी सरकार में मंत्री संजीव बाल्यान ने Economic Times से कहा, 'मायावती हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।' स्पष्ट है कि आगामी चुनावों के बाद जो भी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनेगा, वह प्रधानमंत्री मोदी के बाद सबसे ताकतवर नेता होगा।
2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी, ऐसी ही एक और विजय मोदी के लिए मददगार साबित होगी और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में उन्हें मदद मिलेगी। इसके साथ ही उन्हें 2019 के लोकसभा चुनावों में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि हाल के दिनों में दलितों पर अत्याचार की बढ़ती घटनाओं ने बीजेपी और हिंदू राष्ट्रवादी समर्थकों के खिलाफ दलितों को एकजुट किया है और यही फैक्टर मायावती को नया जीवनदान दे सकता है।
कहां है दलितों के लिए नौकरियां?
फाइल फोटोः मायावती की रैली में आए समर्थक
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मायावती अपनी रैलियों में अल्पसंख्यकों और दलितों से बीजेपी को खारिज करने की अपील करती रही हैं। मायावती के बहुत सारे समर्थक और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हिंदू राष्ट्रवाद को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं। लखनऊ में अपने 3 लाख समर्थकों को संबोधित करते हुए मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि.. दलितों के लिए नौकरियां कहां हैं?
बसपा सुप्रीमो ने कहा कि प्रधानमंत्री को हमारी परेशानी का अंदाजा नहीं है। बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनावों में दलित वोटों के बंटवारे ने मायावती का स्कोर जीरो कर दिया था, लेकिन हाल कि घटनाओं से बसपा प्रमुख एक बार फिर उत्साहित हैं।
यूपी में अमित शाह के 150 दौरे
फाइल फोटो
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मोदी के विश्वासपात्र और मुख्य चुनाव रणनीतिकार अमित शाह पूरी कोशिश में जुटे हैं कि बीजेपी के आधार को परंपरागत वोटरों से आगे ले जाया जाए। पिछले 24 महीनों में शाह ने उत्तर प्रदेश के 150 से ज्यादा दौरे किए हैं।
हालांकि 2012 में समाजवादी पार्टी के हाथों सत्ता गंवाने वाली मायावती भी पूरी तैयारी में है और विरोधियों को चुनौती देने के लिए तैयार हैं, लेकिन ये मायावती ही है कि जिनसे मोदी और शाह को सबसे ज्यादा खतरे की आशंका है।
उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 22 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिमों की आबादी 19 प्रतिशत के करीब है। दोनों समुदाय बीजेपी के साथ कभी भी सहज रूप से नहीं रहा है।
दलित के घर शाह का भोजन
फाइल फोटोः दलित के घर भोजन करते बीजेपी अध्यक्ष
- फोटो : amar ujala
गरीबी और किसानी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में जाति अब भी एक अहम फैक्टर है। कोई भी एक समुदाय अपने दम पर चुनाव जीतने का दावा नहीं कर सकता और ये बात गुजराती अमित शाह को भी पता है। दलितों को लुभाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह मई में दलित परिवार के घर भोजन करने पहुंचे। बीजेपी की कोशिश खुद को दलितों का रहनुमा दिखाने की है।
शाह ने मायावती के कई पुराने साथियों को अपनी पार्टी में शामिल किया है और सूत्रों के मुताबिक आधी से ज्यादा सीटों पर टिकट दलितों को दिए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रशंसा कर चुके हैं। इसी महीने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सालाना बैठक में मुख्य अतिथि के तौर पर एक दलित को बुलाया गया था।