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यूपी : पीएचसी के डॉक्टर भाई को लिए भटकते रहे, न ऑक्सीजन बेड मिला और न बची जान

Fri, 21 May 2021 09:02 PM IST
योगेश साहू शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

व्यवस्था के नाम पर खानापूर्ति भी नहीं हो पा रही। गांव में आखिर है क्या, एक एनएनएम से कितने लोग नापेंगे आक्सीजन और तापमान? गांव में कहां कितने कोरोना से मर गए कैसे बताएं? बिना रणनीतिक तैयारी बढ़ाए तीसरी लहर से गांव को बचाना मुश्किल होगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : बासित जरगर
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विस्तार
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जैसे-जैसे शहरों में कोरोना के मरीजों का दबाव घट रहा है, गांवों में कोरोना काल में पैदा हुई विषम स्थिति सामने आने लगी है। राज्य की एक पीएचसी में तैनात डॉक्टर ने दु:खद व्यथा बताई। बताते हैं कि वह कोरोना के संक्रमितों के इलाज में व्यस्त थे। इस दौरान चुनाव ड्यूटी से लौटे उनके छोटे भाई कोरोना संक्रमित हो गए। तब पता चला कि सरकारी व्यवस्था कहां खड़ी है? बताते हैं कि लाख कोशिश के बाद भी समय पर ऑक्सीजन बेड न मिलने के कारण भाई और बाद में पिता को नहीं बचा सके। सामान्य गांव वाले की दशा तो बहुत खराब थी, अभी भी है।

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पीएचसी के डॉक्टर ने गांव पर जो रिपोर्ट बताई उसको लेकर केंद्र सरकार के रणनीतिकारों का कहना है कि गांव के स्तर तक चिकित्सा सुविधा की दशा खराब है, इसलिए तीसरी लहर के पहले बड़ी रणनीतिक तैयारी जरूरी है। नेशनल कोविड टास्क फोर्स, आईसीएमआर के चेयरमैन डॉ. एनके अरोड़ा गांवों में कोरोना संक्रमण पर कहते हैं कि कुछ भी कह पाना मुश्किल है। हम मानते हैं कि गांवों में संक्रमित हैं। उनका इलाज झोलाछाप डॉक्टर के भरोसे हो पा रहा है। निश्चित रूप से बड़ी विषम परिस्थितियां हैं। डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि अब तो लोगों की जान बचाने का एक मात्र इलाज कोरोना का टीकाकरण ही है। समय कम है, चुनौती बड़ी है। 200 करोड़ टीका की डोज दिसंबर तक लगाने का लक्ष्य पूरा करना होगा। डॉ. अरोड़ा के अनुसार अगर हम यह कर पाए तो ठीक, नहीं तो अगला खतरा और भी बड़ा हो सकता है। वह कहते हैं जुलाई के बाद से टीकाकरण में गुणात्मक तेजी आएगी।

क्या है गांव में इलाज के सूरत-ए-हाल
पीएचसी के चिकित्सक का कहना है कि सीएमओ से बार-बार गुहार के बाद अंतिम समय में ऑक्सीजन बेड मिला। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बनारस में तैनात एक बड़े चिकित्सा अधिकारी को अपने पिता के लिए जिला स्तर कोई सहायता नहीं मिल सकी। उन्हें बनारस ले जाना पड़ा और बचा नहीं सके। सूत्र का कहना है कि यह स्थिति केवल पहले से कमजोर तैयारी के कारण आई। हमें तो 20 अप्रैल के बाद पता चला कि कोरोना से सावधान रहना है। यह एडवाइजरी तो राज्य से आनी चाहिए थी। वह बताते हैं कि अभी सभी डॉक्टर टारगेट पूरा करने में ही व्यस्त हैं। निराशा भरे भाव से कहते हैं कि ड्यूटी कम और टारगेट अधिक पूरा किया जा रहा है। अव्यवस्था देखकर गांव वाले झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं और कोरोना जांच तो आधी अधूरी भी नहीं हो पा रही है।
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सुल्तानपुर की कुड़वार पीएचसी के एक अन्य डॉक्टर का कहना है कि उन्हें होम आइसोलेशन में इलाज करा रहे मरीजों को देखने की जिम्मेदारी मिली है। रोज 10-12 गांव में कहीं एक तो कहीं दो मरीजों को दवा देने जाना होता है। हालांकि वहां 15-20 लोग सर्दी, खांसी, जुकाम आदि से पीड़ित हैं, लेकिन पंजीकृत नहीं हैं। सूत्र का कहना है कि गांव में एनएनएम को ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर दिया गया है, लेकिन व्यवहारिक समस्या है कि कौन सा गांव का संक्रमित हमेशा इसकी जांच कराने के लिए उसके (एनएनएम) दरवाजे खड़ा रहेगा।

एल1, एल2 के बाद एल3 श्रेणी के संक्रमित का क्या होगा?
पीएचसी के ही एक अन्य डॉक्टर की सुनिए। वह कहते हैं कि सरकार की जिला स्तर पर कोविड प्रबंधन नीति अभी तक नहीं समझ पाए। एल1, एल2 श्रेणी के बाद एल3 श्रेणी के मरीज के लिए कुछ भी निधारित नहीं है। जिला अस्पताल में भी एनेस्थेसिया के एक या दो चिकित्सक ही हैं। दूसरे आरटीपीसीआर टेस्ट की प्रॉपर व्यवस्था या स्पष्ट गाइड लाइन ही नहीं है। ऐसे में जिला अस्पताल से लेकर पीएचसी तक केवल खानापूर्ति हो रही है। तीनों चिकित्सकों का कहना है कि अव्यवस्था के कारण गांव वाले या आस-पास के लोग पीएचसी तक भी नहीं आ रहे थे। इसलिए जांच का काम किसी तरह से हुआ और टारगेट भी रह गए हैं। यहां तक कि लोग टीका लगवाने में भी रुचि नहीं ले रहे हैं। इस बारे में एक जिला अस्पताल के वरिष्ठ फार्मासिस्ट ने बताया कि कोरोना टीका का पंजीकरण समेत तमाम प्रक्रियाएं गांव वालों को नहीं समझ में आई। इसलिए उन लोगों ने रुचि नहीं ली।

300 रुपये प्रतिदिन वाले एमबीबीएस छात्रों ने भी नहीं ली रुचि
लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि राज्य सरकार की तैयारी 20 अप्रैल के बाद आनन-फानन में तेज हुई। तब तक कोरोना गांव में फैल गया था। सूत्र का कहना है कि पिछले पांच साल में अस्पतालों में चिकित्सकों, तकनीकी स्टाफ आदि की भर्ती हुई ही नहीं। जब कोरोना के मामले बढ़ गए तब सरकार ने 300 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से एमबीबीएस के छात्रों को इसमें लगाया।

कैसे चली है गांव में कोरोना की लड़ाई?
सीएमओ के पद से जून 2020 में रिटायर हुए डॉक्टर साहब नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि जहां जिलाधिकारी और सीएमओ ने रुचि ली, वहां तो लोगों को कुछ सरकारी चिकित्सा व्यवस्था का लाभ मिल गया। बाकी शहरों, गावों, कस्बों में निजी अस्पतालों, डॉक्टर और झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे रहे लोग। प्रदेश के सभी सीएमओ बहुत दबाव में काम कर रहे हैं। जिला स्तर पर अस्पताल के पास चिकित्सा के संसाधन नहीं हैं। डॉक्टर, तकनीशियन, एनेस्थेसिया समेत अन्य की कमी है। वेंटीलेटर अगर कहीं है भी तो उसके तकनीशियन ही नहीं हैं। पूर्व सीएमओ का कहना है कि गांवों में कोरोना को लेकर डर तो फैला, लेकिन सावधानी, उपाय की जानकारी पहुंच ही नहीं पाई।

अगला खतरा बड़ा है
जिनोमिक्स के वैज्ञानिक अनुराग अग्रवाल कहते हैं कि अगला खतरा बड़ा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के चिकित्सक डॉ. आनंद कृष्णन कहते हैं कि तीसरी लहर दूसरी से भी ज्यादा घातक होगी। इसका असर गांवों में अच्छा खासा हो सकता है। क्योंकि अब गांव तक संक्रमण फैल चुका है। डॉ. एनके अरोड़ा ने भी इसके बाबत एहतियात और चेतावनी दोनों पर जोर दिया। सीएसआईआर के एक वैज्ञानिक इसे दूसरे तरीके से बताते हैं। वह कहते हैं कि जैसे पहली लहर के बाद दूसरी लहर ने बड़ा कोहराम मचाया, वैसे ही तीसरी लहर और घातक होकर आ सकती है। इसलिए हमें तेजी से तैयारी करनी होगी।

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