बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय के बाद से यादव कुनबे में शुरू हुआ घमासान अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के वीटो और सख्त रुख के बाद कौएद और सपा का यह बेमेल रिश्ता तो जल्द ही टूट गया लेकिन इसके चलते रिश्तों में आई खटास जगजाहिर हो गई।
इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री के चाचा और सरकार में नंबर दो कहे जाने वाले शिवपाल यादव की सीएम से नाराजगी भी किसी से छुपी नहीं है, एक दिन पहले मुलायम के अनुज रामगोपाल यादव के जन्मदिन और किताब विमोचन के अवसर पर यह नाराजगी तो मंच पर भी दिखी।
बहरहाल विलय कांड के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का एक नया रूप देखने को मिला, इस मुद्दे पर उन्होंने जिस तरह से स्टैंड लिया और विलय के सूत्रधार कहे जा रहे कैबिनेट मंत्री बलराम यादव पर कार्रवाई की उससे यह संदेश जरूर गया कि पार्टी में बेशक दूसरे कुछ भी निर्णय लेते रहें सरकार के स्तर पर वह कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं।
अखिलेश ने अपने इस कदम से खुद पर लिपटे उस खोल को भी एक झटके में उतार फेंका जिसमें उन पर निर्णय लेने में कमजोर या देर से निर्णय लेने वाले नेता का ठप्पा लगता जा रहा था। अब वह न अपनों के खिलाफ कार्रवाई करने में हिचकते हैं न कानून व्यवस्था के मुद्दे पर सवाल करने वालों को जवाब देने में।
कड़े निर्णय लेने में नहीं चूक रहे मुख्यमंत्री अखिलेश
- फोटो : amar ujala
कुछ ही दिन बीते हैं जब उन्होंने सीतापुर जिले के बिसवां से सपा विधायक रामपाल यादव को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया। ये मुख्यमंत्री के तल्ख तेवर ही थे कि पुलिस और लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को कभी मुलायम सिंह के खास रह चुके विधायक रामपाल के अवैध निर्माणों को गिराने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं हुई।
यह तस्वीर भी कुछ दिन पहले मीडिया में काफी सुर्खियों में रही थी जिसमें एक सभा के दौरान वह अपने मंच पर बाहुबली अतीक अहमद को हाथ से पीछे धकेलते दिख रहे हैं जो मुख्यमंत्री के नजदीक आने का प्रयास कर रहे थे। साफ था कि अखिलेश अपनी छवि को लेकर सचेत हैं और वह मंच के साथ ही पार्टी में ऐसे किसी नेता को जगह नहीं देना चाहते जो उन पर सवाल उठाने का मौका दे। कौमी एकता दल मामले को ही लें तो उन्होंने तब तक इस पर जुबान नहीं खोली जब तक पार्टी ने इस विलय को रद नहीं कर दिया।
कहने वाले इसे चुनावों के लिए मुख्यमंत्री की कवायद के तौर पर ही देख रहे हैं जिसमें सरकार की छवि चमकाने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि पिछले कुछ में अखिलेश ने खुद को राजनीतिक तौर पर परिपक्व और काफी मजबूत किया है।
सरकार पर तो उनकी पकड़ है ही पार्टी में भी उनकी राय को पूरी तवज्जो दी जा रही है। बात विकास की करें तो चार साल से ज्यादा के कार्यकाल में अखिलेश जो नहीं कर पाए उसे अब तेजी से हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं, विकास की तमाम योजनाओं को धार दी जा रही है तो अटकी पड़ी परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने के लिए वह सख्त कदम उठाने से भी नहीं चूक रहे हैं।
अखिलेश के प्रयास से बदल रही सरकार की छवि
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ये अखिलेश के प्रयासों का ही असर है कि पिछले कुछ समय में पार्टी के प्रति लोगों की धारणा बदली है। तमाम योजनाएं ऐसी हैं जिन्हें देखकर सरकार की तारीफ की जा सकती है। अखिलेश के इन प्रयासों से ही चुनावों से पूर्व सपा एक बार फिर मुख्य मुकाबले में आती दिख रही है। इसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि विरोधी भाजपा नेता तक दावा करने लगे हैं कि राज्य में असली टक्कर उनके और सपा के बीच ही है। हालांकि यह भी साफ है कि अखिलेश की इस धुआंधार बैटिंग के पीछे मेंटर की भूमिका में उनके पिता और पार्टी के शिखर पुरुष मुलायम सिंह ही हैं जो हर मुद्दे पर उनके पीछे खड़े दिख रहे हैं।
लेकिन इन तमाम कवायदों के बीच बड़ा सवाल ये है कि अखिलेश को अगर बीते चार सालों में इसी तरह खुलकर काम करने का मौका दिया जाता तो क्या वह और बेहतर प्रदर्शन कर सकते थे?
क्या सरकार और पार्टी के स्तर पर उन्हें और छूट दी जाती तो वह सपा नेताओं की उस निरंकुशता पर लगाम लगा सकते थे जिसके लिए पार्टी हमेशा से कटघरे में रही है।
सवाल ये भी है कि अगर मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें मनमुताबिक काम करने दिया जाता तो युवा होने के नाते वह और दमखम दिखाकर उस उम्मीद पर खरा उतर सकते थे जो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनसे की गई थी।
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