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आकृति चौधरी एनएसए मामला: हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी यूपी सरकार, दायर की अपील

Wed, 09 Sep 2026 04:25 PM IST
राहुल कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लेने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर की जाएगी।

 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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छात्रा व एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत रद्द करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले को चुनौती देगी। इस फैसले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया गया था। मेहता ने यह बयान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ के समक्ष दिया। उन्होंने ग्रेटर नोएडा के एक छात्र को नोटिस जारी करने के संबंध में भी बात की।

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने स्पष्ट किया कि ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट ने जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए छात्र को नोटिस जारी किया था। उन्होंने कहा कि नोएडा के जिलाधिकारी को मीडिया से इस संबंध में कई सवाल मिल रहे हैं। पीठ ने याद दिलाया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में गौतम बुद्ध नगर प्रशासन के एक अन्य छात्र की हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया था। उच्च न्यायालय ने उस छात्र को मुआवजा भी दिया था। इस पर मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार उस फैसले को भी चुनौती दे रही है। आज ही, मुख्य न्यायाधीश ने ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने पूछा कि अदालत के पिछले आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगेगा

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
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दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की एनएसए के तहत हिरासत को रद्द कर दिया था और पांच लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह मुआवजा उनकी हिरासत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाए। इसमें गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम और अन्य अधिकारी शामिल हैं।

हाईकोर्ट ने नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन में कथित भूमिका को लेकर आकृति चौधरी पर एनएसए लगाए जाने के फैसले की कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने हिरासत के आधार को सिर्फ अनुमान पर आधारित और पर्याप्त सामग्री के अभाव वाला पाया था।
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हाईकोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई को "उपहास के योग्य" बताते हुए संबंधित अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया था। अब राज्य सरकार इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है।आकृति चौधरी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलतराम कॉलेज से हिस्ट्री में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद वह डीयू से ही कानून की पढ़ाई कर रही हैं। आकृति चौधरी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं।

वह अपने कॉलेज के दिनों से ही छात्र एक्टिविस्ट के तौर पर काम करने लगीं। कुछ महीने पहले जब नोएडा में 40 हजार से ज्यादा मजदूर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे, तो उस प्रदर्शन में आकृति चौधरी का नाम सामने आया था। इसी मामले में उन पर एनएसए के तहत कार्रवाई की गई थी, जिसे अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है।

एनएसए के तहत गिरफ्तारी

आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास स्नातक हैं। उन्हें अप्रैल 2026 के नोएडा श्रमिक विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को चौधरी और कार्यकर्ता-पत्रकार सत्य वर्मा के खिलाफ एनएसए लगाया था। वे कई कार्यकर्ताओं में से थे जिन्हें अधिक मजदूरी की मांग वाले शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से संबंधित मामलों में गिरफ्तार किया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में नौकरशाही और पुलिस की भूमिकाओं पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अधिकारियों को नागरिकों के सांविधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण को बनाए रखने के लिए अपार शक्तियां सौंपी गई हैं।

अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज होगी नाराजगी

उच्च न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों को इन जिम्मेदारियों को निभाना चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जिलाधिकारी और डोजियर तैयार करने में शामिल पुलिस अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में उसकी नाराजगी दर्ज की जाए। यह आदेश नौकरशाही के मनमाने आचरण पर अदालत की गंभीर चिंता को दर्शाता है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सांविधानिक सिद्धांतों का पालन करना अधिकारियों का कर्तव्य है। इस फैसले से अधिकारियों की जवाबदेही तय करने में मदद मिलेगी।

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