सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी नियमों पर रोक लगा दी है, लेकिन इसके बाद भी सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच भाजपा सरकार के प्रति नाराजगी में कोई कमी नहीं आई है। वे सर्वोच्च न्यायालय से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में भी इन नियामों के विरोध में युवा सड़कों पर आ गए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले चुनावों में भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। सामान्य युवा वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के सबसे बड़े समर्थक वर्ग में माना जाता है। केंद्र से लेकर यूपी सहित विभिन्न राज्यों में भाजपा की सरकार बनवाने में इस वर्ग ने बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन नए यूजीसी नियमों से इस वर्ग का आक्रोश देखते हुए भाजपा के समीकरण गड़बड़ा सकते हैं।
CSDS लोकनीति के एक सर्वे में यह बात उभर कर सामने आई थी कि पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा का समर्थन अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे युवाओं की तुलना में पढ़े लिखे वर्ग में अधिक था। 2014 में 66 प्रतिशत युवाओं ने वोट किया था। 18 से 25 वर्ष के युवाओं का वोट प्रतिशत 68 प्रतिशत था। भाजपा को 34 प्रतिशत युवाओं का वोट मिला था, जबकि कांग्रेस इसके लगभग आधे 19 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई थी। युवाओं का मोदी और भाजपा के प्रति यह आकर्षण लगातार आगे ही बढ़ता रहा। लेकिन यूजीसी नियमों के बाद शुरू हुए विरोध को देखते हुए माना जा रहा है कि यदि पार्टी ने इसे संभालने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठाया तो उसे इसका नुकसान हो सकता है।
'असमानता को बढ़ा रहा ये नियम'
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला से कहा कि यूजीसी के नए प्रावधान पूरी तरह संविधान विरोधी हैं। संविधान में हर व्यक्ति की समानता की बात की गई है, लेकिन यूजीसी के नए नियमों ने सामान्य वर्ग को सीधे अपराधी जैसा करार दे दिया है। उन्होंने कहा कि सामान्य वर्ग के बच्चों, विशेषकर छात्राओं को भेदभाव और आपराधिक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन वर्तमान नियमों के कारण अब उन्हें कॉलेज कैंपस में न्याय पाने तक का भी अधिकार नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जिस कमेटी को जांच करने का अधिकार दिया गया है, उसमें भी सामान्य वर्ग की भागीदारी को सुनिश्चित न करने और पारदर्शिता न होने के कारण सामान्य वर्ग के छात्रों को नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इन नियमों को तत्काल वापस लेना चाहिए।
'बीजेपी में भी चिंता, विरोध'
भाजपा के अंदरखाने भी इस नुकसान पर चर्चा हो रही है। सामान्य वर्ग के अनेक कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। सामान्य वर्ग के नेता ही नहीं, अन्य वर्ग के भाजपा नेताओं का भी मानना है कि इससे भाजपा का आधार वोट खिसक सकता है। उत्तर प्रदेश भाजपा के नेताओं को अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों से भी इन नियमों के विरोध में लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। एक भाजपा नेता का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो क्षेत्र में निकलना भी मुश्किल हो सकता है।
सहयोगी दलों का विरोध
अखिलेश यादव ने भी यूजीसी मुद्दे पर स्पष्ट किया है कि किसी भी निर्दोष के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। इससे भाजपा के सहयोगी दल भी दबाव में आ गए हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा के सहयोगी दल दूसरे सामाजिक समीकरणों को साधते हैं। अनुप्रिया पटेल और ओम प्रकाश राजभर पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन इन दलों का भी आकलन है कि यूजीसी नियमों से उन्हें नुकसान हो सकता है। संजय निषाद ने नए नियमों का स्वागत किया है, लेकिन चर्चा है कि उन्हें भी इसके नुकसान का डर सता रहा है। इन सहयोगी दलों को भी जीत के लिए भाजपा का समर्थन मिलता है, लेकिन यूजीसी नियमों पर विरोध देखते हुए उन्हें भी नुकसान होने की संभावना है।