यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने आज गोरखपुर में एक कार्यक्रम के दौरान कई किस्से सुनाए। उनके ये किस्से भगवान राम के ईर्द-गिर्द घुमते रहे। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या इन किस्सों के जरिए योगी अपनी मंशा बता रहे थे, क्योंकि जब से वो सीएम बने हैं, उनकी भाषा और भाषण की शैली दोनों बदलती नजर आ रही है। सीएम योगी ने गंभीरनाथ के शताब्दी पुण्यतिथि समारोह में भगवान राम का जिक्र किया और दो किस्से सुनाए।
पहला किस्सा : अकबर और तुलसीदास
सीएम योगी ने अकबर और तुलसीदास के किस्से सुनाते हुए कहा कि अकबर ने तुलसीदास को संदेश भिजवाया कि आ कर मिलें। संदेश एक से दो बार, तीन बार होते जब कई बार हो गया और तुलसी दास नहीं गए तो अकबर ने उन्हें कैद कर के बुलवाया। तुलसी दरबार में पेश किए गए। अकबर ने पूछा कि, 'इतनी बार आप को संदेश भेजा आप आए क्यों नहीं?' तुलसी दास ने बताया कि, 'मन नहीं हुआ आने को। इस लिए नहीं आया।' अकबर ने कहा, 'मैं तो आप को अपना नवरत्न बनाना चाहता हूं, आप को मालूम है?' तुलसी दास ने फिर उसी विनम्रता से जवाब दिया,'हां, मालूम है।'
अब अकबर संशय में पड़ गया। धीरे से बोला, 'लोग यहां नवरत्न बनने के लिए क्या नहीं कर रहे, नाक तक रगड़ रहे हैं और आप हैं कि नवरत्न बनने के लिए इच्छुक ही नहीं दिख रहे? आखिर बात क्या है?' तुलसी दास ने अकबर से दो टूक कहा कि, 'आप ही बताइए कि जिस ने नारायण की मनसबदारी कर ली हो, वह किसी नर की मनसबदारी कैसे कर सकता है भला?' योगी ने कहा कि तुलसीदास जी तब नारा दिया-राजा रामचंद्र की जय और इस तरह तुलसीदार जी ने कभी अकबर को राजा नहीं माना था। उनका कहना था कि मेरा राजा एक ही है, वो हैं भगवान राम।
दूसरा किस्सा : सिकंदर और योगी
योगी आदित्यनाथ ने दूसरा किस्सा सुनाते हुए कहा कि सिकंदर विश्व विजेता बनना चाहता था। भारत को जीत लेने और कुछ दिन यहां गुजार लेने के पश्चात विश्व विजेता सिकंदर भारत से लौटने की तैयारी कर रहा था। किसी ने उसे सलाह दी कि उसे हिंदुस्तान से अपने साथ एक योगी को ले जाना चाहिए। काफी तलाश के बाद उसे जंगल में पेड़ के नीचे एक ध्यानमग्र योगी दिखाई दिया।
जब योगी ने अपनी आंखें खोलीं तो वह बोला, ‘‘आप मेरे साथ यूनान चलो, मैं आपको धन-धान्य से भर दूंगा।’’ योगी ने मना कर दिया। तब वह अपने असली रूप में आ गया। तलवार निकालकर बोला, ‘‘मैं तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।’’ योगी ने हंसकर कहा, ‘‘तुम मेरे टुकड़े नहीं कर सकते क्योंकि मैं अमर हूं। दूसरा तुम साहसी नहीं हो। एक साहसी ही अपने विरोधी को क्षमा कर सकता है। इसके अलावा तुम विजेता भी नहीं हो, तुम मेरे दास के दास हो। मैंने बड़ी साधना के बाद क्रोध को जीता है। अब वह मेरा दास है, तुम उसके काबू में हो। विजेता तब होते जब मेरे गुस्सा दिलाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते।’’
योगी की बातों ने सिकंदर की आंखें खोल दीं, उसे समझ आ गया कि जब उसका अपने ही क्रोध पर काबू नहीं है तो वह खुद को विजेता कैसे कह सकता है।