फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा केंद्र की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार के तमाम विकास कार्यों के नाम पर जनता से वोट मांगती रही, लेकिन पार्टी सपा-बसपा के गठबंधन की चोट ने करारा प्रहार कर दिया। भाजपा के इस उप चुनाव में हार के कई फैक्टर रहे।
फैक्टर 1- आखिरी वक्त में बनाया गठबंधन पड़ गया भारी
उपचुनाव में बसपा द्वारा समाजवादी पार्टी को समर्थन दिए जाने के बाद भाजपा के चुनाव प्रचार में खासा असर पड़ा। पार्टी नेता पूर्व में मोदी और योगी द्वारा किए गए विकास कार्यों के नाम पर जनता से वोट मांग रहे थे, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन हो जाने के बाद सीएम, डिप्टी सीएम समेत प्रचार में लगे सभी कैबिनेट मंत्री सिर्फ अखिलेश और माया पर ही अपनी भड़ास निकालते रहे। इस वजह से पार्टी का चुनाव प्रचार दूसरी दिशा में भटक गया और बसपा के कैडर वोटों के साथ सपा के परंपरागत वोटों ने मिलकर जीत दिला दी।
फैक्टर 2 -बाहरी प्रत्याशी के आने से नाराज थे स्थानीय कार्यकर्ता
भाजपा ने इस बार उपचुनाव में वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेंद्र सिंह पटेल को चुनाव मैदान में उतार कर हर किसी को चौंका दिया। पार्टी के इस निर्णय से स्थानीय कार्यकर्ता खासे नाराज रहे। कौशलेंद्र पर शुरुआत से ही बाहरी होने का ठप्पा लग गया। विपक्षी पार्टियों ने भी इसका खासा प्रचार किया। स्थानीय सभाओं में डैमेज कंट्रोल करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी कहना पड़ गया कि कौशलेंद्र को डिप्टी सीएम के कहने पर प्रत्याशी बनाया गया।
फैक्टर 3- संघ ने भी नहीं ली चुनाव में कोई खास रुचि
फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में इस बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने कोई खास योगदान नहीं दिया। मतदान के ठीक पहले संघ के बड़े पदाधिकारी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में हिस्सा लेने नागपुर चले गए। चर्चा इस बात की है कि कौशलेंद्र को फूलपुर से प्रत्याशी बनाये जाने पर भाजपा नेतृत्व ने संघ के पदाधिकारियों को विश्वास में नहीं लिया था। जबकि मतदान के लिए वोटरों तक पर्ची पहुंचाने और उन्हें केंद्र तक ले जाने का काम संघ कार्यकर्ता बखूबी करते हैं।